Rajasthan News: सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के एक दहेज मृत्यु मामले (Dowry Death Case) में हो रही अत्यधिक देरी पर गुरुवार को बेहद तल्ख टिप्पणी की है. साल 2003 से लंबित एक याचिका के कारण गंभीर अपराध की सुनवाई 23 सालों तक रुकी रही, जिसे कोर्ट ने 'न्यायिक प्रणाली की साख पर प्रहार' बताया है. जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट से पूरे केस की आदेश पत्रावली (Record) तलब कर ली है.
क्या है पूरा मामला?
यह मामला दीपिका नाम की महिला से जुड़ा है, जिसकी शादी नवंबर 2000 में हुई थी. शादी के महज एक साल बाद, 31 दिसंबर 2001 को वह ससुराल में मृत पाई गई. जनवरी 2002 में दहेज उत्पीड़न (498A) और जहर देकर हत्या (304B) के आरोपों में मामला दर्ज हुआ. नवंबर 2002 में आरोपियों पर आरोप तय हुए, लेकिन 2003 में हाईकोर्ट में एक पुनरीक्षण याचिका दायर हुई और तब से ट्रायल पर रोक लग गई.
'सरकार क्या कर रही थी?'
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा से सीधा सवाल किया कि पिछले 20 वर्षों में राज्य सरकार ने इस केस को आगे बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाए? कोर्ट ने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से भी रिपोर्ट मांगी है कि यह केस कितनी बार बोर्ड पर आया और किन कारणों से इस पर सुनवाई नहीं हो सकी.
देशभर के हाईकोर्ट्स के लिए बड़े निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को नजीर मानते हुए देश के सभी हाईकोर्ट्स को आदेश दिया है कि वे ऐसे मामलों की लिस्ट बनाएं जिनमें हत्या, दुष्कर्म और दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराधों की ट्रायल ऊपरी अदालतों में लंबे समय से स्थगित पड़ी है. अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में अनिश्चितकालीन स्थगन से न्यायिक प्रणाली की साख प्रभावित होती है और इस पर सख्त निगरानी जरूरी है.
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