
राजस्थान सरकार दो अगस्त को विधानसभा में किसान ऋण राहत आयोग की स्थापना के लिए एक विधेयक पारित कराने की तैयारी में है. सरकार इसके जरिए किसानों को कर्ज से राहत देगी. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने बजट में भी इसका वादा किया था. व्यापार सलाहकार समिति की बैठक के बाद ये विधेयक सदन में पेश होने के लिए तैयार है.
सरकारी सूत्रों के अनुसार किसान ऋण राहत आयोग एक अर्ध न्यायिक निकाय होगा, जिसकी अध्यक्षता राजस्थान उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत न्यायाधीश करेंगे. जो किसान वित्तीय संकट, फसल हानि और प्राकृतिक आपदाओं के कारण ऋण चुकाने में असमर्थ हैं और यदि बैंक ऋण भुगतान में चूक करने पर उनकी जमीन की नीलामी या जब्ती की दिशा में आगे बढ़ें तो वे ऋण राहत आयोग में अपील कर सकेंगे.
गहलोत सरकार ने किसानों का कर्ज माफ करने का चुनावी वादा किया था और पिछले 4 सालों में लगभग 21 लाख किसानों का कुल 15 हजार करोड़ का कर्ज माफ किया है.
लेकिन ये बड़े पैमाने पर सहकारी बैंकों से हैं, क्योंकि केंद्र सरकार के तहत वाणिज्यिक और राष्ट्रीयकृत बैंकों ने किसानों के ऋण माफ नहीं किए हैं. मुख्यमंत्री ने खुद पेशकश की थी कि अगर केंद्र कर्ज माफ करेगा तो राज्य सरकार अपना हिस्सा देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
इसलिए चुनावी वर्ष में यह राजनीतिक रूप से एक कदम भी है कि राज्य सरकार संकट में फंसे किसानों के लिए एक उपाय लेकर आए.
किसान ऋण राहत आयोग का यह भी प्रस्ताव है कि यदि किसान का कोई मामला आयोग के पास लंबित है तो बैंक संकट ग्रस्त किसानों की भूमि की नीलामी तब तक नहीं करेंगे, जब तक कि ऋण राहत आयोग द्वारा मामले का निपटारा नहीं कर दिया जाता. इससे किसानों को बड़ी राहत मिलेगी.
ऋण राहत आयोग बैंकों के साथ भी बातचीत करेगा और सूत्रों के अनुसार उसके पास यह तय करने की शक्ति भी होगी कि ऋण कैसे चुकाया जाना चाहिए, कभी-कभी ऋण चुकाने की समय सीमा भी बढ़ाई जाएगी.