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विवाह से पहले पत्नी को छात्रवृत्ति मिली, प्रशासन ने पति को स्कीम से किया बाहर, हाईकोर्ट ने पलटा फैसला

कोर्ट ने कहा कि विवाह से पहले महिला अपने पिता के परिवार की सदस्य होती है और विवाह के बाद पति के परिवार का हिस्सा बन जाती है. ऐसे में एक ही छात्रवृत्ति के आधार पर दो अलग-अलग परिवारों को अयोग्य ठहराना अनुचित है.

विवाह से पहले पत्नी को छात्रवृत्ति मिली, प्रशासन ने पति को स्कीम से किया बाहर, हाईकोर्ट ने पलटा फैसला

Swami Vivekananda Scholarship Scheme: राजस्थान हाईकोर्ट ने 'स्वामी विवेकानंद स्कॉलरशिप फॉर एकेडमिक एक्सीलेंस स्कीम' से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. शनिवार (17 जनवरी) को आदेश कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह से पहले पत्नी को मिली छात्रवृत्ति के आधार पर पति को इस योजना से वंचित नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि विवाह से पहले महिला अपने पिता के परिवार की सदस्य होती है और विवाह के बाद पति के परिवार का हिस्सा बन जाती है. ऐसे में एक ही छात्रवृत्ति के आधार पर दो अलग-अलग परिवारों को अयोग्य ठहराना अनुचित है. साथ ही इसे योजना के मूल उद्देश्य के भी विरुद्ध बताया. 

याचिकाकर्ता देवेंद्र कुमार कोठारी ने अपने बेटे प्रखर कोठारी की ओर से रिट याचिका दायर की थी. याचिका में बताया गया कि उनका बेटा नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के केलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में अमेरिका में पोस्ट-ग्रेजुएट प्रोग्राम कर रहा है. उन्होंने राज्य सरकार की स्वामी विवेकानंद छात्रवृत्ति योजना में आवेदन किया, लेकिन 19 दिसंबर 2025 को इसे खारिज कर दिया गया. 

प्रशासन ने बताया था योजना के लिए अयोग्य

प्रशासन ने मौखिक रूप से कारण बताया कि प्रखर की पत्नी आरुषि असावा को 9 सितंबर 2022 को इसी योजना के तहत छात्रवृत्ति मिल चुकी है. योजना की शर्त 9(ii) के अनुसार ई-3 श्रेणी में एक परिवार से केवल एक सदस्य को ही लाभ मिल सकता है, इसलिए प्रखर को अयोग्य माना गया.

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अभिनव शर्मा और पूजा शर्मा ने पैरवी की. उन्होंने तर्क दिया कि आरुषि को छात्रवृत्ति विवाह से पहले मिली थी. प्रखर से उनका विवाह 1 अप्रैल 2023 को हुआ. ऐसे में विवाह पूर्व की छात्रवृत्ति को पति के परिवार से जोड़ना कानूनी और तार्किक रूप से गलत है. दलील दी गई कि छात्रवृत्ति जैसी कल्याणकारी योजनाओं की व्याख्या संकीर्ण या तकनीकी नहीं होनी चाहिए. इसका उद्देश्य मेधावी छात्रों को आर्थिक मदद देकर उच्च शिक्षा के द्वार खोलना है, न कि उनके नियंत्रण से बाहर के आधारों पर उन्हें रोकना.

सरकार ने दिया ये तर्क

वहीं, राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दलील दी कि योजना की शर्तें स्पष्ट हैं, "ई-3 श्रेणी में एक परिवार से केवल एक सदस्य ही लाभ ले सकता है. पत्नी को पहले लाभ मिल चुका है, इसलिए पति को देना नियमों का उल्लंघन होगा. सरकार ने कहा कि योजना लाभकारी है, लेकिन शर्तों से बाहर विस्तार संभव नहीं."

कोर्ट ने कहा- व्याख्या व्यावहारिक हो

दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस अनुरूप सिंह ने फैसला दिया, “छात्रवृत्ति का लक्ष्य वित्तीय बाधाओं को हटाकर योग्य छात्रों को उच्च शिक्षा उपलब्ध कराना है. ऐसी योजनाओं की व्याख्या उदार, व्यावहारिक और उद्देश्यपूर्ण होनी चाहिए, न कि कठोर या तकनीकी. एक छात्रवृत्ति को दो परिवारों के लिए अयोग्यता का आधार बनाना स्वीकार्य नहीं." कोर्ट ने पूर्व मामले ‘आराध्या जैन बनाम राजस्थान' का भी जिक्र किया, जिसमें हाइपर-टेक्निकल अप्रोच को गलत ठहराया गया था.

हाईकोर्ट ने 19 दिसंबर 2025 के खारिजगी आदेश को रद्द कर दिया. राज्य सरकार और चयन समिति को निर्देश दिए कि प्रखर के आवेदन पर मेरिट के आधार पर योजना नियमों के अनुसार नया विचार करें, बिना पुरानी अस्वीकृति से प्रभावित हुए.

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