राजस्थान हाई कोर्ट ने पोक्सो (नाबालिग से यौन अपराध निवारण) अधिनियम से जुड़े एक मामले को रद्द करते हुए केंद्र सरकार को कानून में 'रोमियो-जूलियट' प्रावधान जोड़ने का सुझाव दिया है. जस्टिस अनिल उपाध्याय की एकलपीठ ने 19 वर्षीय युवक की याचिका पर यह फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि पोक्सो कानून में लड़की की सहमति को महत्व नहीं दिया जाता.
"सहमति वाले संबंधों में भेद नहीं कर पाता"
2012 से पहले 16-18 वर्ष की आयु के किशोरों के सहमति वाले संबंध अपराध की श्रेणी में नहीं आते थे, लेकिन अब तकनीकी उम्र के आधार पर ये गंभीर अपराध बन जाते हैं. जस्टिस उपाध्याय ने कहा, "देशभर के आंकड़े बताते हैं कि पोक्सो के बड़े हिस्से 'रोमियो-जूलियट' प्रकार के हैं, जहां किशोर-युवा कमिटेड रिलेशनशिप में होते हैं. मौजूदा कानून यौन शोषण और सहमति वाले संबंधों में भेद नहीं कर पाता."
"रोमियो-जूलियट मामलों में अलग प्रावधान जोड़ा जाए"
कोर्ट ने केंद्र से अपील की कि रोमियो-जूलियट मामलों के लिए अलग प्रावधान जोड़ा जाए, जिससे अदालतों को वास्तविक न्याय देने की गुंजाइश मिले. दरअसल, इस केस में 19 वर्षीय युवक पर 17 वर्षीय किशोरी का अपहरण कर यौन शोषण का आरोप लगा. किशोरी ने पुलिस और ट्रायल कोर्ट में स्पष्ट कहा कि वह अपनी मर्जी से घर छोड़कर गई थी. युवक ने कोई जबरदस्ती नहीं की, न ही कोई जबरन संबंध बना. मेडिकल रिपोर्ट में भी यौन शोषण की पुष्टि नहीं हुई. फिर भी पुलिस ने अपहरण और बलात्कार की धाराओं में चालान पेश किया, जबकि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी पर आरोप तय कर दिए.
अदालत ने इसे 'मशीनरी जैसा' काम बताया
अदालत ने इसे 'मशीनरी जैसा' काम बताया. जस्टिस उपाध्याय ने कहा, "पोक्सो कानून बच्चों को यौन शोषकों से बचाने के लिए है, न कि सहमति वाले युवा रिश्तों को दंडित करने के लिए. जब पीड़िता खुद आरोपी को बेकसूर बता रही है, और मेडिकल सबूत इसका समर्थन करते हैं, तो अदालत आंखें नहीं मूंद सकती." कोर्ट ने एफआईआर, ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई रद्द कर दी.
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