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Rajasthan News: फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र बना कर RPSC से ले ली नौकरियां, अब तक गिरफ्तार 4 आरोपी 

प्रकरण की शुरुआत 13 अगस्त 2025 को हुई जब आरपीएससी के अनुवाद अधिकारी मुकुट बिहारी शर्मा ने सिविल लाइन थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई. दस्तावेज सत्यापन के दौरान अरुण शर्मा के दिव्यांग प्रमाण पत्र को लेकर संदेह उत्पन्न हुआ था.

Rajasthan News: फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र बना कर RPSC से ले ली नौकरियां, अब तक गिरफ्तार 4 आरोपी 

Ajmer News: अजमेर में फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र बनाकर सरकारी नौकरी हासिल करने के मामले में पुलिस ने सिलसिलेवार कार्रवाई करते हुए चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है. जांच के अनुसार पहली गिरफ्तारी 2 फरवरी 2026 को अरुण शर्मा की हुई, जो राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) में स्टेनोग्राफर पद पर कार्यरत था. इसके बाद 3 फरवरी को डेगाना के जावा निवासी ई-मित्र संचालक रामनिवास जाट को पकड़ा गया. 5 फरवरी को जेएलएन अस्पताल के ठेका कर्मचारी मोडू राम उर्फ मनीष तथा उसी दिन शाम को अस्पताल से सेवानिवृत्त चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी दिलीप कुमार वैष्णव को भी गिरफ्तार किया गया.

प्रकरण की शुरुआत 13 अगस्त 2025 को हुई जब आरपीएससी के अनुवाद अधिकारी मुकुट बिहारी शर्मा ने सिविल लाइन थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई. दस्तावेज सत्यापन के दौरान अरुण शर्मा के दिव्यांग प्रमाण पत्र को लेकर संदेह उत्पन्न हुआ था. मामला दर्ज होने के बाद जांच सिविल लाइन थाने के सब इंस्पेक्टर गिरिराज को सौंपी गई. दस्तावेजों की तकनीकी व विभागीय जांच के बाद प्रमाण पत्र फर्जी होने के संकेत मिले, जिसके आधार पर पुलिस ने कार्रवाई शुरू की.

20 हजार में बना प्रमाण पत्र, ई-मित्र से अस्पताल तक जुड़ी कड़ी

पुलिस जांच में सामने आया कि अरुण शर्मा ने कथित तौर पर रामनिवास जाट को ₹20,000 देकर फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाया. इसके बाद प्रमाण पत्र पर सील-साइन कराने के लिए रामनिवास ने जेएलएन अस्पताल के ठेका कर्मचारी मोडू राम से संपर्क किया. आरोप है कि मोडू राम ने वर्ष 2019 में दिलीप कुमार वैष्णव से संपर्क कर दस्तावेज पर नेत्र रोग विभाग की सील व हस्ताक्षर करवाए. इसी प्रमाण पत्र के आधार पर अरुण शर्मा को आरपीएससी में स्टेनोग्राफर पद का लाभ मिला.

 रिटायर्ड कर्मचारी के पास मिली कई विभागों की सील

पुलिस ने दिलीप कुमार वैष्णव, निवासी वन विहार वैशाली नगर, से पूछताछ के बाद उसके किराए के मकान पर तलाशी ली. यहां से करीब 27 से अधिक सील बरामद की गईं, जो नाक-कान-गला, अस्थि रोग, नेत्र रोग सहित विभिन्न विभागों की बताई जा रही हैं. बरामद सील में एक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, पीसांगन की सील भी शामिल बताई गई है. इतनी बड़ी संख्या में सरकारी सील मिलने से अन्य फर्जी प्रमाण पत्रों पर उपयोग की आशंका जताई जा रही है.

पैसों का बंटवारा और आगे की जांच जारी

प्रारंभिक पूछताछ में सामने आया कि ₹20,000 की राशि आपस में बांटी गई—जिसमें लगभग ₹10,000, ₹8,000 और ₹2,000 अलग-अलग स्तर पर दिए गए. फिलहाल अरुण शर्मा, रामनिवास जाट और मोडू राम न्यायिक अभिरक्षा में हैं, जबकि दिलीप कुमार वैष्णव पुलिस रिमांड पर है. जांच अधिकारी अब यह पता लगाने में जुटे हैं कि बरामद सील और हस्ताक्षरों का उपयोग किन-किन प्रमाण पत्रों में हुआ और इस नेटवर्क से कितने लोग लाभान्वित हुए. पुलिस का कहना है कि मामले में आगे और खुलासे संभव हैं.

दिव्यांग प्रमाण पत्र प्रकरण में जेएलएन अस्पताल अधीक्षक का स्पष्टीकरण, जांच जारी

जवाहरलाल नेहरू अस्पताल के अधीक्षक डॉ. अरविंद खरे ने कथित दिव्यांग प्रमाण पत्र मामले में अस्पताल की भूमिका को लेकर स्थिति स्पष्ट की है. उन्होंने बताया कि इस प्रकरण की जानकारी उन्हें तब मिली जब आरपीएससी सचिव रामनिवास मेहता की ओर से लिखित पत्र प्राप्त हुआ. पत्र मिलने के बाद अस्पताल प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए नेत्र रोग विभाग के विशेषज्ञ चिकित्सकों का मेडिकल बोर्ड गठित किया.

डॉ. खरे के अनुसार बोर्ड के निर्देश पर आरोपी स्टेनोग्राफर अरुण शर्मा की विजुअल इवोक्ड पोटेंशियल (VEP) जांच जयपुर के एसएमएस अस्पताल में कराई गई. जांच रिपोर्ट में अरुण शर्मा की दृष्टि दिव्यांग श्रेणी के निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाई गई. इसके बाद पूरी मेडिकल रिपोर्ट आरपीएससी को आधिकारिक रूप से प्रेषित कर दी गई.

अधीक्षक ने कहा कि उपलब्ध चिकित्सीय साक्ष्यों के आधार पर संबंधित व्यक्ति का दिव्यांग श्रेणी में पात्र होना प्रमाणित नहीं होता. ऐसे में दिव्यांग प्रमाण पत्र पर अस्पताल की सील व हस्ताक्षर किस प्रकार अंकित हुए, यह जांच का विषय है. फिलहाल सिविल लाइन थाना पुलिस पूरे प्रकरण की जांच कर रही है और दस्तावेजों की सत्यता खंगाली जा रही है.

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