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This Article is From Aug 12, 2025

बाड़मेर में दम तोड़ रही पारंपर‍िक हस्‍तकला, बुनकर बोले- सरकार बाजार दे तो मेहनत बेकार नहीं जाएगी

बाड़मेर जिले के बुनकर, जो पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं, अब मेहनत के बदले उचित दाम और सरकारी संरक्षण के अभाव में हताश हो रहे हैं.

बाड़मेर में दम तोड़ रही पारंपर‍िक हस्‍तकला, बुनकर बोले- सरकार बाजार दे तो मेहनत बेकार नहीं जाएगी
बाड़मेर जिले के बुनकर, जो पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं.

रेगिस्तान के सुदूर गांवों और ढाणियों में, जहां कभी चरखों की खटखट और ताणे-बाने की लय गूंजती थी, आज सन्नाटा पसरा है. भेड़, बकरी और ऊंट के बालों से हाथ की कारीगरी से बुने गए कंबल, दरी, टोपी और मफलर जैसे उत्पाद, जो कभी ग्रामीण परिवारों की आजीविका का आधार थे, अब आधुनिक मशीनरी के युग में लुप्त होने की कगार पर हैं. 

परंपरा को बचाने की जद्दोजहद

बाड़मेर के आटी गांव के भूराराम, तीसरी पीढ़ी के बुनकर, बताते हैं कि उनके पुरखे ऊंट और बकरी के बालों से धागा कातकर दरी, भाखल (जमीन पर बिछाने का सामान), बोरा, टोपी, मफलर, पट्टू और शॉल जैसे उत्पाद बनाते थे. लेकिन अब उनके बच्चे इस पेशे से मुंह मोड़ रहे हैं. भूराराम कहते हैं, “एक आइटम बनाने में कई दिन की मेहनत लगती है, लेकिन बाजार में मशीन से बने सस्ते सामान के सामने हमारी मेहनत बेकार हो रही है.”

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स्थानीय बाजार में इनकी मांग न के बराबर 

आधुनिकता की मांग को देखते हुए भूराराम जैसे बुनकरों ने आक के रेशे और पशुओं के बालों से नए उत्पाद बनाना शुरू किया. टोपी, बेल्ट, पायदान, कुशन सेट, कप कॉस्टर और सेना के लिए बर्फीले इलाकों में उपयोगी ऊनी मफलर जैसे आधुनिक आइटम उनकी कारीगरी का नमूना हैं. लेकिन स्थानीय बाजार में इनकी मांग न के बराबर है. भूराराम का कहना है, “अगर सरकार हमें बाजार उपलब्ध कराए, तो हम अपनी आजीविका आसानी से चला सकते हैं. ” उनके घर में चरखा, ताणा और अटेरणी जैसे पुराने औजार अब धूल फांक रहे हैं, क्योंकि नई पीढ़ी इस मेहनत भरे काम में रुचि नहीं ले रही.

संरक्षण की कमी, रोजगार का संकट

इंटेक संगठन से जुड़े यशोवर्धन शांडिल्य बताते हैं कि बाड़मेर में कई परिवार इस पारंपरिक हस्तकला से जुड़े हैं. वे मेले और प्रदर्शनियों के जरिए इन उत्पादों को बढ़ावा देने की कोशिश करते हैं, लेकिन सरकारी नीतियों के अभाव में यह व्यवसाय दम तोड़ रहा है. यशोवर्धन कहते हैं, “हाथ से बने इन उत्पादों की विदेशों में अच्छी मांग है और ऊंचे दाम मिलते हैं, लेकिन ग्रामीण बुनकर, जो ज्यादातर अनपढ़ हैं, ऑनलाइन या बड़े शहरों में अपने उत्पाद नहीं बेच पाते. ”

विदेशों में मांग, गांव में उपेक्षा

हाथ की बुनकारी से बने ये उत्पाद विदेशी बाजारों में अपनी अनूठी बनावट और पर्यावरण-अनुकूल गुणों के कारण लोकप्रिय हैं. लेकिन बाड़मेर के सुदूर गांवों में रहने वाले बुनकरों को न तो ऑनलाइन मार्केटिंग की जानकारी है और न ही उनके पास बड़े बाजारों तक पहुंचने के संसाधन. यशोवर्धन का सुझाव है कि सरकार को इस व्यवसाय को बचाने के लिए नीतियां बनानी चाहिए, जैसे उत्पादों की खरीद की गारंटी देना या बुनकरों को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ना.

आगे की राह

बाड़मेर की यह बुनकारी न केवल एक कला है, बल्कि ग्रामीण आजीविका और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है. अगर सरकार और समाज इस हुनर को संरक्षण दे, तो न केवल बुनकरों को रोजगार मिलेगा, बल्कि यह परंपरा भी जीवित रहेगी. भूराराम जैसे कारीगरों की उम्मीद अब सरकारी पहल और बाजार की मांग पर टिकी है, ताकि उनके हाथों का हुनर फिर से रेगिस्तान की रेत में चमक सके.

आवाज उठाएं, विरासत बचाएं

बाड़मेर के बुनकरों की कहानी सिर्फ एक व्यवसाय की नहीं, बल्कि एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के अस्तित्व की लड़ाई है. क्या हम इस कला को आधुनिकता की दौड़ में गुम होने देंगे, या इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएंगे? यह सवाल हम सभी के सामने है.

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