
राजस्थान के ज्यादातर शहर पर्यटन के लिए मशहूर हैं, पर इनमें इसमें चूरू की अपनी एक अलग ही पहचान है. चूरू थार रेगिस्तान के किनारे पर सुनहरी रेत के टीलों के बीच स्थित एक छोटा सा शहर है. इसे “गेटवे टू थार डेजर्ट” भी कहा जाता है. यह अपनी शानदार हवेलियों, भित्ति चित्रों और बेहतरीन वास्तुकला के लिए जाना जाता है. चुरू उत्तरी राजस्थान के ऐतिहासिक शेखावाटी क्षेत्र में का एक हिस्सा है. वास्तुकला प्रेमी पर्यटकों के लिए यह एक विशेष आकर्षण का केंद्र है. इसके अलावा चूरू के बाजारों में आप राजस्थानी मसाले और तरह-तरह स्वादिष्ट पापड़ भी ले भी सकते हैं. प्रसिद्ध उद्योगपति लक्ष्मीनिवास मित्तल चूरू के सुजानगढ़के ही मूल निवासी हैं.
मौसम और जलवायु के मामले में चूरू राजस्थान का सबसे गर्म व ठंडा जिला है. साथ ही यह राजस्थान का सर्वाधिक वार्षिक तापान्तर वाला जिला है. गर्मी में यहां बेतहाशा गर्मी, तो जाड़े में हाड़ कंपा देने वाली ठंड पड़ती है. चूरू जिले में कोई नदी नहीं बहती है. यहां की तालछापर झील एक खारे पानी की झील है. चूरू राजस्थान का राज्य में सबसे कम वन क्षेत्र वाला जिला है और यहां कोई भी नदी प्रवाहित नहीं होती है.
चूहड़ा जाट ने 1620 ई. में की थी स्थापना
चूरू जिले की स्थापना चूहड़ा जाट ने 1620 ई. में की थी. बाद में इस पर राठौर (बनिरोट) राजपूतों का शासन हो गया. सन् 1871 की लड़ाई के बाद यह क्षेत्र बीकानेर के प्रभुत्व में आ गया. स्वतंत्रता के समय यह बीकानेर रियासत का भाग था. 1948 में, इसका पुनर्गठन होने पर इसे बीकानेर से अलग कर दिया गया. 1 नवम्बर 1956 को पूर्ण एकीकरण के तहत चूरू को जिले का दर्जा दिया गया.
1857 में अंग्रेजों पर बरसाए थे चांदी के गोले
चूरू 1857 के विद्रोह के दौरान देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम का भी एक केंद्र बना, जब यहां के ठाकुर शिव सिंह अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हो गए. इसके चलते ब्रिटिश अधिकारियों ने बीकानेर सेना के समर्थन से चूरू किले पर हमला किया. किले को चारों तरफ से घेर लिया गया था और तोपें चलाई गईं, जिसका ठाकुर शिव सिंह की सेना ने भरपूर जवाब दिया, लेकिन एक समय चुरू सेना पास गोले खत्म हो गए.
जिससे चूरू के किले की प्रतिष्ठा के साथ-साथ स्वतंत्रता भी बरकरार रही.
दुनिया भर में मशहूर हैं शानदार हवेलियां
रेत के टीलों और काले हिरणों के अभयारण्य के लिए भी प्रसिद्ध चुरू जिला अपनी हवेलियों के लिए भी प्रसिद्ध है. यहाँ की कोठारी हवेली, ढोलामारु के विशाल चित्र, छह मंजिली सुराणा हवेली, जिसमें 1100 दरवाजे व खिड़कियां हैं,खेमका व पारखों की हवेलियां,दानचंद चौपड़ा की हवेली, कन्हैयालाल बागला की हवेली, आठ खम्भों की छतरी, टकडैतों की छतरियां, गंगाजी का मठ आदि प्रसिद्ध हैं.
आस्था के केंद्रों पर माथा टेकने आते हैं श्रद्धालु
चूरू के ऐतिहासिक स्थलों के अलावा यहां कई प्राचीन देवालय व आस्था के केंद्र भी हैं, जिनके दर्शन करने देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं का यहां सालभर तांता लगा रहता है. यहां के मंदिरों में पहला नाम आता है सालासर बालाजी मंदिर का, जिसकी स्थापना मोहनदास जी ने की थी. इसी के पास हनुमान जी की माता अंजनी देवी का मंदिर भी है. इसके अलावा चूरू में संत गोगा जी का जन्म स्थान ददरेवा भी है, जहां, भादो महीने में कृष्णा नवमी को विशाल मेला लगता है. यहां के गोपालपुरा स्थान के बारे में कहा जाता है कि इसे महाभारत काल में द्रोणपुर के नाम से जाना जाता था और इसको पांडवों के गुरू द्रोणाचार्य ने बसाया था. सागर सिंधी मंदिर अपनी बेजोड़ काँच की जड़ाई और स्थापत्य कला के लिए जाना जाता है.
चूरू एक नजर में
- भौगोलिक स्थिति – 27°24′ से 29°0′ उत्तरी अक्षांश तथा 73°40′ से 75°41′ पूर्वी देशान्तर
- क्षेत्रफल - 16830 वर्ग किमी.
- जनसंख्या - 20,39,547
- जनसंख्या घनत्व - 147
- लिंगानुपात - 940
- साक्षरता दर - 66.8%
- तहसीलें - 7 (चूरू, रतनगढ़, सरदार शहर, तारा नगर, सुजानगढ़, राजगढ़, बीदासर)
- विधानसभा क्षेत्र - 6 (चूरू, सादुलपुर, तारानगर, सरदार शहर, रतनगढ़, सुजानगढ़)