
भारत अपनी विभिन्नता, संस्कृति और सभ्यता के कारण पूरी दुनिया में आकर्षण का केंद्र रहा. इतिहास गवाह है, आदिकाल से यहां विदेशियों का आना-जाना जारी है. इसमें कई आक्रमणकारी भी थे, कई विद्वान भी. जिन्होंने भारत के लिए बहुत कुछ काम भी किया. इसी आकर्षण के कारण यहां इटली के विद्वान डॉ. लुई पी. तैस्सितोरी ने राजस्थान की यात्रा की. आज उनकी जयन्ती है, राजस्थानी भाषा पर बेशुमार मेहनत कर उसे समृद्ध बनाने वाले इस महान विद्वान का जन्म 13 दिसम्बर 1887 को इटली के 'उदीने' नामक प्रसिद्ध नगर में हुआ था. आइए जानते हैं कि इटली के विद्वान डॉ. लुई पी. तैस्सितोरी की कहानी, जिन्होंने राजस्थानी भाषा को समृद्ध कर पूरे राजस्थानी को अपना कर्जदार बना दिया.
श्री हजारीमल बांठिया ने सर्वप्रथम इटली वासियों के निमन्त्रण पर 11 नवम्बर, 1985 को डॉ. तैस्सितोरी की जन्मभूमि 'उदीने' नगर की यात्रा की. उन्हीं के द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'श्री हजारीमल बांठिया अभिनन्दन ग्रन्थ-बांठिया समग्र' के द्वारा हमें उदीने की विस्तृत जानकारी मिली. उसी के आधार पर संक्षेप में कहा जा सकता है कि- 'उदीने' इटली का लगभग एक हजार वर्ष पुराना सांस्कृतिक नगर है. पहाड़ी व मैदानी इलाकों से युक्त यह नगर रोमन युग में एक किले की तरह था, परन्तु 899 ई. में हंगरी के द्वारा आक्रमण के बाद राजमहल को बचाया नहीं जा सका. बारहवीं से 14वीं शताब्दी तक व्यावसायिक गतिविधियों का विकास हुआ.

कई भाषाओं के जानकार थे डॉ. तैस्सितोरी
डॉ. तैस्सितोरी बाल्यकाल से ही अत्यन्त प्रखर बुद्धियुक्त थे. भारत के लोगों ने प्रमाणित कर दिया कि वे मस्तिष्क के कार्यों के प्रत्येक क्षेत्र में मुकाबला कर सकते थे. उन्होंने अपने देश में ही फ्लोरेंस युनिवर्सिटी से अंग्रेजी में एम.ए. किया. वहीं रहते हुए उन्होंने हिन्दी व संस्कृत भाषा का अध्ययन किया. तुलसीदास के हिन्दी ग्रन्थ 'रामचरितमानस' तथा महाकवि वाल्मीकि के संस्कृत ग्रन्थ 'रामायण' पर तुलनात्मक अध्ययन करके सन् 1910 में शोध निबन्ध लिखा. यही शोध प्रबन्ध बाद में अंग्रेजी में भाषान्तरित हुआ, जिससे डॉ. ग्रियर्सन आकर्षित हुए और उन्होंने एशियाटिक सोसायटी में तैस्सितोरी शोध कार्य के लिए आमन्त्रित किया.
वे अपने देश इटली में रहते हुए भारत में आचार्य प्रवर विजयधर्मसूरि और अन्य कई विद्वानों से हिन्दी व गुजराती में ही पत्र-व्यवहार करते थे. इस प्रकार विविध विषयों और भाषाओं के प्रति उनकी ज्ञान-पिपासा उनके प्रत्येक आचरण व व्यवहार में साफ झलकती थी.
राजस्थान की मरुभूमि में रच-बस गये
कहना न होगा कि उनकी इसी ज्ञान-क्षुधा एवं पिपासा ने उन्हें सुदूर देश (राजस्थान) की ओर आने को प्रेरित किया. वे यहीं की साहित्यिक व सांस्कृतिक मरुभूमि में रच-बस गये. उन्होंने न दिन देखा न रात, न चिलचिलाती धूप और न धूलभरी आंधियों की परवाह की और न हड्डियों तक को जमाने वाली सर्दी की. घोड़े पर बैठे, ऊंटों पर कष्टसाध्य सवारी की और न हुआ तो पैदल ही यह ज्ञान-पिपासु अपना तृषा- सिन्धु लिए दर-दर भटकता रहा.
डॉ. तैस्सितोरी महान् पुरातत्त्ववेत्ता, गम्भीर भाषा वैज्ञानिक, बहुभाषाविद्, व्याकरण प्रणेता, वैज्ञानिक दीठ के कुशल सम्पादक आदि कई विधाओं व विषयों में निपुण थे. ऐसे में हम कह सकते हैं कि डॉ. एल. पी. तैस्सिलोरी के पास एक सैनिक का हृदय कलाकार के हाथ वैज्ञानिक का मस्तिष्क, कवि की स्वप्नदर्शी आंख और यायावर के गतिशील पांव थे. ऐसे भारतीय लुई, जिसने बीकाणे की धरा का गौरव बढाया, राजस्थानी भाषा, साहित्य, संस्कृति, कला एवं पुरातत्त्व के लिए अपने आपको होम कर दिया.
डॉ. तैस्सितोरी का सफर रहा शानदार
डॉ. तैस्सितोरी अन्तिम बार 1 नवम्बर, 1919 को भारत पहुंचे. बीकानेर में 5 नवम्बर को लिखी गई डायरी के अन्तिम पन्नों से उनकी अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों के शान्त और निश्चल कार्य के देश में तथा अपनी पुस्तकों की शान्ति और धैर्य के बीच पहुंचने से अत्यधिक प्रसन्नता प्रकट की गई है. उन्होंने अपनी डायरी में एक स्थान पर लिखा है 'इस भवन में बिताये जाने वाले मेरे कुछ मास वर्ष बन जाएं.' उनकी यह मनोकामना बहुत हद तक पूर्ण हो गई. परन्तु दुर्भाग्यवश इस महान आत्मा का निमोनिया के कारण 32 वर्ष की अल्पायु में ही 22 नवम्बर, 1919 को बीकानेर में स्वर्गवास हो गया.
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