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केस रिकॉर्ड में गड़बड़ी पर हाईकोर्ट का सख्त: पॉक्सो जज के आचरण की जांच... किशोर आरोपी को मिली डिफॉल्ट जमानत

हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक रिकॉर्ड की शुचिता और विश्वसनीयता न्याय प्रणाली की आधारशिला है. यदि रिकॉर्ड में बाद में दस्तावेज जोड़े जाने या तथ्यों को छिपाने का संदेह हो, तो यह संस्थागत विश्वास के लिए गंभीर चिंता का विषय है.

केस रिकॉर्ड में गड़बड़ी पर हाईकोर्ट का सख्त: पॉक्सो जज के आचरण की जांच... किशोर आरोपी को मिली डिफॉल्ट जमानत

Rajasthan High Court: जोधपुर राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म के एक संवेदनशील मामले में न्यायिक रिकॉर्ड में पाई गई गंभीर विसंगतियों पर सख्त रुख अपनाते हुए संबंधित पॉक्सो कोर्ट के न्यायिक अधिकारी के आचरण की जांच के लिए मामला मुख्य न्यायाधीश को भेज दिया है. साथ ही कोर्ट ने आरोपी किशोर को वैधानिक (डिफॉल्ट) जमानत देने का आदेश दिया है. मामला जोधपुर जिले के लूणी थाना क्षेत्र में दर्ज दुष्कर्म प्रकरण से जुड़ा है. अगस्त 2025 में दर्ज एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि एक किशोर और अन्य व्यक्ति ने पीड़िता के साथ दुष्कर्म किया. 

जांच के दौरान किशोर को निरुद्ध कर बाल सुधार गृह भेजा गया. निर्धारित 90 दिन की अवधि में चार्जशीट दाखिल न होने का हवाला देते हुए आरोपी ने डिफॉल्ट जमानत मांगी, जिसे निचली अदालत और अपीलीय अदालत ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि चार्जशीट समय पर पेश कर दी गई थी.

न्यायिक रिकॉर्ड में गड़बड़ी

आरोपी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने रिकॉर्ड का परीक्षण किया. कोर्ट ने पाया कि 21 नवंबर 2025 को चार्जशीट दाखिल होने का दावा तो किया गया, लेकिन उस तारीख का कोई समकालीन आदेश-पत्र रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है. केवल चार्जशीट के कवर पृष्ठ के पीछे मजिस्ट्रेट की टिप्पणी दर्ज थी, जिसे अदालत ने पर्याप्त प्रमाण नहीं माना.

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि 24 नवंबर 2025 के आदेश-पत्र में जमानत आवेदन खारिज होने का उल्लेख है, जबकि रिकॉर्ड के अनुसार जमानत आवेदन 28 और 29 नवंबर को प्रस्तुत और निरस्त किया गया. अदालत ने टिप्पणी की कि कोई न्यायिक आदेश उस घटना से पहले दर्ज नहीं हो सकता जो घटी ही नहीं हो- ऐसी स्थिति आदेश के पूर्व दिनांकित होने की आशंका उत्पन्न करती है.

प्रकरण को मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया

हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक रिकॉर्ड की शुचिता और विश्वसनीयता न्याय प्रणाली की आधारशिला है. यदि रिकॉर्ड में बाद में दस्तावेज जोड़े जाने या तथ्यों को छिपाने का संदेह हो, तो यह संस्थागत विश्वास के लिए गंभीर चिंता का विषय है. हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दे रही, परंतु उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया जांच की आवश्यकता दर्शाती है. इसी कारण प्रकरण को आगे की कार्रवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश को भेज दिया गया.

साथ ही कोर्ट ने माना कि जांच 90 दिन में पूरी नहीं हुई और चार्जशीट समय पर दाखिल होने का विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं है. ऐसे में आरोपी को डिफॉल्ट जमानत का वैधानिक अधिकार प्राप्त हो गया. अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि पीड़िता के बयान में किशोर की स्पष्ट भूमिका का उल्लेख नहीं है, जो जमानत पर विचार करते समय प्रासंगिक पहलू है.

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