
Rajasthan Elections: राजस्थान में मतदान की सभी तैयारी पूरी हो चुकी है. कल यानी कि शनिवार 25 नवंबर को प्रदेश की सभी 199 सीटों पर सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक मतदान होना है. चुनाव में कांग्रेस राज्य में रिवाज बदल कर दोबारा सत्ता में आना चाहती है तो वहीं भाजपा राज बदल कर प्रदेश में सरकार बनाना चाहती है. इन सब के बीच राजधानी जयपुर से 500-600 किलोमीटर दूर दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी इलाके में दो पार्टियों ने इन दलों की मुश्किलें बढ़ा दी है. आदिवासी पहचान, अस्मिता और जल-जंगल-जमीन बचाने के मुद्दों को लेकर लोगों के बीच जाने वाले आदिवासी पार्टी को लोगों ने बहुत पसंद किया है. बीटीपी ने पिछली बार 2 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था.
बिखराव के बीच भाजपा-कांग्रेस को दिख रही उम्मीद
पिछली बार बीटीपी से चुनाव जीते राजकुमार रोत इस बार भी चुनावी मैदान में हैं. लेकिन इस बार उन्होंने भारत आदिवासी पार्टी के नाम से नई पार्टी बनाई है. वे पार्टी का प्रमुख चेहरा हैं. कई विश्लेषक मानते हैं कि बीटीपी और बीएपी के अलग होने से आदिवासी पहचान की राजनीति करने वालों को धक्का लगेगा और दक्षिणी राजस्थान में एक बार फिर लड़ाई भाजपा-कांग्रेस में होगी.
'आरक्षण छीनने वालों को पीटने के काम आती है हॉकी स्टिक'
राजकुमार रोत अपनी सभाओं में कांग्रेस और भाजपा को एक बताते हैं. वे दोनों दलों पर आदिवासियों की उपेक्षा का आरोप लगाते हैं. वे अपना चुनाव चिन्ह दिखाकर लोगों से कहते हैं, ‘यह स्टिक बड़े काम की चीज़ है. बुढ़ापे में सहारा देती है. खेलने के काम भी आती है और आरक्षण छीनने वालों को पीटने के भी काम आती है. वे अपने अभियान में आदिवासी पहचान, आरक्षण की बात मजबूती से रखते हैं.
ग्रामीण और आदिवासी युवाओं में पार्टी का प्रभाव
आदिवासी बाहुल्य डूंगरपुर-बांसवाड़ा जिले में भी 25 से 30 प्रतिशत आबादी गैर आदिवासियों की है. इस इलाके में राजकुमार और उनकी पार्टी से बड़ी संख्या में आदिवासी युवा जुड़े हैं. दक्षिणी राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में हर उम्र के लोग पार्टी के बारे में बात करते हैं.

उनकी पार्टी से बड़ी संख्या में आदिवासी युवा जुड़े हैं
युवाओं में पार्टी को लेकर क्रेज है और वे आदिवासी पार्टी के प्रति आकर्षित भी हो रहे हैं. वे भाजपा और कांग्रेस को एक बताते हैं और डूंगरपुर नगर परिषद के चुनाव का जिक्र भी करते हैं, जब भाजपा और कांग्रेस ने एक होकर बीएपी का चेयरमैन नहीं बनने दिया था. लेकिन शहरी इलाकों और गैर-आदिवासियों के बीच पार्टी को अपने कदम जमाने में अभी और वक़्त लगेगा.
बीटीपी को रोकने के लिए एक हो गयी थीं भाजपा-कांग्रेस
क्यों महत्वपूर्ण है आदिवासी वोट बैंक?
राजस्थान में आदिवासी आबादी 13.48% है. विधानसभा की 25 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. जाहिर है यह संख्या प्रदेश की सत्ता तक पहुंचने के लिए अहम है. भाजपा वनवासी कल्याण परिषद के काम के सहारे इस इलाके में फैलने की कोशिश करती है तो कांग्रेस भी आदिवासियों को रिझाने के कई प्रयास करती है. आदिवासी पार्टी ने भले ही दोनों दलों को परेशान किया हो लेकिन संघ और कांग्रेस के लोग ऐसा नहीं मानते.

गांव-गांव में जाकर सभाएं करते हैं रोत
आदिवासी पार्टी को चुनौती नहीं मानते संघ और कांग्रेस के कार्यकर्ता
डूंगरपुर में वनवासी कल्याण आश्रम के अंतर्गत चलने वाले छात्रावास में कार्यरत आरएसएस के कार्यकर्ता लालू कहते हैं, ‘हम सालों से आदिवासियों के बीच काम करते आए हैं. वे जानते हैं कि कौन उनका सच्चा सेवक है और कौन चुनावी सेवक. हमारे काम को किसी के उभार से कोई दिक्कत नहीं होगी.'
वहीं कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता बीएपी को वोटकटवा पार्टी बताते हुए कहते हैं, ‘चुनाव कोई भी लड़ सकता है लेकिन वोटकटवा पार्टियों को इतना मत नहीं मिलेगा जिससे हमें कोई नुकसान हो. आदिवासी समुदाय के लिए कांग्रेस ने काम किया है और पार्टी को इसका इनाम मिलेगा.'

आदिवासियों के कोर मुद्दों को संबोधित करती हैं आदिवासी पार्टियां
पार्टियां कुछ भी कहे, आंकड़े मजबूती की गवाही दे रहे
पार्टियां भले ही इनकार करे लेकिन आकंड़े आदिवासी पार्टी के उभार की कहानी कहते हैं. उनकी नामांकन रैलियों में भीड़ से लेकर पिछले उपचुनाव तक के परिणाम यह बताते हैं कि आदिवासी अंचल की राजनीति में कुछ तो हलचल हुई है.
धारियावाद उपचुनाव में आदिवासी पार्टी समर्थित उम्मीदवार ने दूसरा स्थान हासिल किया और 2018 चुनाव की विजेता भाजपा को तीसरे स्थान पर धकेल दिया था. अब यह हलचल स्थायी रहती है या पानी में फूटे बुलबुले की तरह ही रह जाती है, यह देखने वाली बात होगी.