विज्ञापन
Story ProgressBack
This Article is From Nov 24, 2023

पहचान, अस्मिता और आरक्षण के मुद्दे, क्या दक्षिणी राजस्थान में BJP-कांग्रेस की सियासी जमीन खिसका देंगी आदिवासी पार्टियां?

भाजपा-कांग्रेस भले ही इनकार करें लेकिन आकंड़े आदिवासी पार्टी के उभार की कहानी कहते हैं. उनकी नामांकन रैलियों में भीड़ से लेकर पिछले उपचुनाव तक के परिणाम यह बताते हैं कि आदिवासी अंचल की राजनीति में कुछ तो हलचल हुई है.

Read Time: 6 mins
पहचान, अस्मिता और आरक्षण के मुद्दे, क्या दक्षिणी राजस्थान में BJP-कांग्रेस की सियासी जमीन खिसका देंगी आदिवासी पार्टियां?
एक चुनावी सभा के दौरान राजकुमार रोत.

Rajasthan Elections: राजस्थान में मतदान की सभी तैयारी पूरी हो चुकी है. कल यानी कि शनिवार 25 नवंबर को प्रदेश की सभी 199 सीटों पर सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक मतदान होना है. चुनाव में कांग्रेस राज्य में रिवाज बदल कर दोबारा सत्ता में आना चाहती है तो वहीं भाजपा राज बदल कर प्रदेश में सरकार बनाना चाहती है. इन सब के बीच राजधानी जयपुर से 500-600 किलोमीटर दूर दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी इलाके में दो पार्टियों ने इन दलों की मुश्किलें बढ़ा दी है. आदिवासी पहचान, अस्मिता और जल-जंगल-जमीन बचाने के मुद्दों को लेकर लोगों के बीच जाने वाले आदिवासी पार्टी को लोगों ने बहुत पसंद किया है. बीटीपी ने पिछली बार 2 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था. 

बिखराव के बीच भाजपा-कांग्रेस को दिख रही उम्मीद

पिछली बार बीटीपी से चुनाव जीते राजकुमार रोत इस बार भी चुनावी मैदान में हैं. लेकिन इस बार उन्होंने भारत आदिवासी पार्टी के नाम से नई पार्टी बनाई है. वे पार्टी का प्रमुख चेहरा हैं. कई विश्लेषक मानते हैं कि  बीटीपी और बीएपी के अलग होने से आदिवासी पहचान की राजनीति करने वालों को धक्का लगेगा और दक्षिणी राजस्थान में एक बार फिर लड़ाई भाजपा-कांग्रेस में होगी. 

राजकुमार रोत इससे इनकार करते हैं. वे कहते हैं, ‘पिछली बार हम ही बीटीपी को लेकर आये थे. अब उनके पास कुछ नहीं है. उनके पास कार्यकर्ता होते तो धारियावाद उपचुनाव में हम दूसरे नम्बर पर नहीं रहते और उनकी जमानत जब्त नहीं होती.' 

'आरक्षण छीनने वालों को पीटने के काम आती है हॉकी स्टिक'

राजकुमार रोत अपनी सभाओं में कांग्रेस और भाजपा को एक बताते हैं. वे दोनों दलों पर आदिवासियों की उपेक्षा का आरोप लगाते हैं. वे अपना चुनाव चिन्ह दिखाकर लोगों से कहते हैं, ‘यह स्टिक बड़े काम की चीज़ है. बुढ़ापे में सहारा देती है. खेलने के काम भी आती है और आरक्षण छीनने वालों को पीटने के भी काम आती है. वे अपने अभियान में आदिवासी पहचान, आरक्षण की बात मजबूती से रखते हैं.

ग्रामीण और आदिवासी युवाओं में पार्टी का प्रभाव

आदिवासी बाहुल्य डूंगरपुर-बांसवाड़ा जिले में भी 25 से 30 प्रतिशत आबादी गैर आदिवासियों की है. इस इलाके में राजकुमार और उनकी पार्टी से बड़ी संख्या में आदिवासी युवा जुड़े हैं. दक्षिणी राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में हर उम्र के लोग पार्टी के बारे में बात करते हैं.

उनकी पार्टी से बड़ी संख्या में आदिवासी युवा जुड़े हैं

उनकी पार्टी से बड़ी संख्या में आदिवासी युवा जुड़े हैं

युवाओं में पार्टी को लेकर क्रेज है और वे आदिवासी पार्टी के प्रति आकर्षित भी हो रहे हैं. वे भाजपा और कांग्रेस को एक बताते हैं और डूंगरपुर नगर परिषद के चुनाव का जिक्र भी करते हैं, जब भाजपा और कांग्रेस ने एक होकर बीएपी का चेयरमैन नहीं बनने दिया था. लेकिन शहरी इलाकों और गैर-आदिवासियों के बीच पार्टी को अपने कदम जमाने में अभी और वक़्त लगेगा.

बीटीपी को रोकने के लिए एक हो गयी थीं भाजपा-कांग्रेस
 

दिसंबर 2020 में जिला परिषद के चुनाव में डूंगरपुर में बीटीपी के 13 उम्मीदवार जीत कर आये. भाजपा के 8 और कांग्रेस के 6 उम्मीदवार जीते थे. ट्राइबल पार्टी को चुनाव हराने के लिए तब भाजपा और कांग्रेस एक हो गयी थी और बीटीपी का चेयरमैन नहीं बन पाया था.

क्यों महत्वपूर्ण है आदिवासी वोट बैंक?

राजस्थान में आदिवासी आबादी 13.48% है. विधानसभा की 25 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. जाहिर है यह संख्या प्रदेश की सत्ता तक पहुंचने के लिए अहम है. भाजपा वनवासी कल्याण परिषद के काम के सहारे इस इलाके में फैलने की कोशिश करती है तो कांग्रेस भी आदिवासियों को रिझाने के कई प्रयास करती है. आदिवासी पार्टी ने भले ही दोनों दलों को परेशान किया हो लेकिन संघ और कांग्रेस के लोग ऐसा नहीं मानते.

गांव-गांव में जाकर सभाएं करते हैं रोत

गांव-गांव में जाकर सभाएं करते हैं रोत

आदिवासी पार्टी को चुनौती नहीं मानते संघ और कांग्रेस के कार्यकर्ता

डूंगरपुर में वनवासी कल्याण आश्रम के अंतर्गत चलने वाले छात्रावास में कार्यरत आरएसएस के कार्यकर्ता लालू कहते हैं, ‘हम सालों से आदिवासियों के बीच काम करते आए हैं. वे जानते हैं कि कौन उनका सच्चा सेवक है और कौन चुनावी सेवक. हमारे काम को किसी के उभार से कोई दिक्कत नहीं होगी.' 

वहीं कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता बीएपी को वोटकटवा पार्टी बताते हुए कहते हैं, ‘चुनाव कोई भी लड़ सकता है लेकिन वोटकटवा पार्टियों को इतना मत नहीं मिलेगा जिससे हमें कोई नुकसान हो. आदिवासी समुदाय के लिए कांग्रेस ने काम किया है और पार्टी को इसका इनाम मिलेगा.'

आदिवासियों के कोर मुद्दों को संबोधित करती हैं आदिवासी पार्टियां

आदिवासियों के कोर मुद्दों को संबोधित करती हैं आदिवासी पार्टियां

पार्टियां कुछ भी कहे, आंकड़े मजबूती की गवाही दे रहे

पार्टियां भले ही इनकार करे लेकिन आकंड़े आदिवासी पार्टी के उभार की कहानी कहते हैं. उनकी नामांकन रैलियों में भीड़ से लेकर पिछले उपचुनाव तक के परिणाम यह बताते हैं कि आदिवासी अंचल की राजनीति में कुछ तो हलचल हुई है.

धारियावाद उपचुनाव में आदिवासी पार्टी समर्थित उम्मीदवार ने दूसरा स्थान हासिल किया और 2018 चुनाव की विजेता भाजपा को तीसरे स्थान पर धकेल दिया था. अब यह हलचल स्थायी रहती है या पानी में फूटे बुलबुले की तरह ही रह जाती है, यह देखने वाली बात होगी. 

यह भी पढ़ें- ADR Report: राजस्थान में BJP के 176 प्रत्याशी करोड़पति, कांग्रेस के रफीक मंडेलिया 166 करोड़ की संपत्ति के साथ सबसे अमीर

Rajasthan.NDTV.in पर राजस्थान की ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें. देश और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं. इसके अलावा, मनोरंजन की दुनिया हो, या क्रिकेट का खुमार, लाइफ़स्टाइल टिप्स हों, या अनोखी-अनूठी ऑफ़बीट ख़बरें, सब मिलेगा यहां-ढेरों फोटो स्टोरी और वीडियो के साथ.

फॉलो करे:
डार्क मोड/लाइट मोड पर जाएं
Our Offerings: NDTV
  • मध्य प्रदेश
  • राजस्थान
  • इंडिया
  • मराठी
  • 24X7
Choose Your Destination
Previous Article
Rajasthan Politics: हरीश चौधरी की कविता से क्यों हुआ विवाद? विरोध करने सत्ता पक्ष के साथ खड़े हो गए रविंद्र सिंह भाटी
पहचान, अस्मिता और आरक्षण के मुद्दे, क्या दक्षिणी राजस्थान में BJP-कांग्रेस की सियासी जमीन खिसका देंगी आदिवासी पार्टियां?
Dummy candidates caught in 10th-12th open examination, were giving exam in place of Sarpanches in Barmer Rajasthan
Next Article
अब 10वीं-12वीं की ओपन परीक्षा में भी पकड़े गए डमी कैंडिडेट, सरपंचों के बदले दे रहे थे परीक्षा
Close
;