
क़रीब 6 हज़ार किलोमीटर का सफर तय कर प्रवासी पक्षी कुरजां (डेमोसाइल क्रेन) साइबेरिया से जैसलमेर पहुंच गए हैं. लंबा सफर तय करने वाले पक्षी कुरजां न तो अपनी राह भटकते है और न ही इनके यहां पहुंचने का समय गड़बड़ाता है. हर साल सितंबर के पहले पखवाड़े में ये यहां पहुँच जाते हैं.
मौसम में बदलाव का दौर शुरू होते ही कुरजां पक्षियों का साइबेरिया से उड़ान भरकर राजस्थान आने का सिलसिला शुरू हो जाता है, क्योंकि साइबेरिया से ब्लैक समुद्र, चीन, मंगोलिया आदि देशों में सितंबर में कड़ाके की ठंड पड़ती है. ऐसे में कुरजां पक्षी भारत व पश्चिमी राजस्थान का रुख करते हैं.
स्थानीय लोगों ने बताया कि कुरजां पक्षी तालाबों की तलाश करती है इस बार अब खेतोलाई, चाचा गांव के पास तालाबों पर पड़ाव डाल दिया है .पहले जत्थे के बाद अब कुरजां की आवक शुरू होगी और 6 महीने तक सरहदी जिले के कई तालाब और आस-पास इनका प्रवास रहेगा.
कुछ बरस से ये कुरजां ठीक तीन सितम्बर को यहां पहुंचते हैं. इस बार भी ये ठीक तीन सितम्बर को ही जैसलमेर जिले के खेतोलाई व चाचा गांव में पहुंच गए. मौसम में बदलाव शुरू होते ही हज़ारों की तादाद में कुरजां भारतीय मैदानों की तरफ उड़ान भरना शुरू कर देती हैं . बगैर किसी जीपीएस की मदद के ये पक्षी करीब छह हजार किलोमीटर का सफर तय कर मारवाड़ पहुंच जाती हैं .

कुरजां ऐ म्हारा भंवर मिलादयो ऐ, संदेशो म्हारे पिया ने पुगाद्यो ऐ.......
कुरजां राजस्थान वासियों के लिए कभी पराए नहीं रहे. वे राजस्थान के लोक गीतों में, यहाँ के सांस्कृतिक विरासत में जैसे रच बस गए हों. राजस्थानी लोकगीतों में कुरजां का स्थान बेहद खूसूरता है. उन पर बहुत से लोक गीत बने. उनमें से एक है
ऐसे कई लोकगीत को कुरजां को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं. किसी का प्रेमी या पति बाहर है तो कुरजां पक्षी से उसके हाल पूछे जाते हैं. क्योंकि वह भी बाहर से ही उड़कर आया है. और ऐसे कुरजां पक्षी राजस्थान की संस्कृति में ही बस गया है.
जैसे-जैसे सर्दियां बढ़ेंगी इसके साथ ही इनकी संख्या बढ़ती जाएगी.सर्दियों के मौसम में सबसे ज़्यादा कुरजां लाठी इलाक़े में डेरा डालती हैं. ज़िले में देगराय ओरण और आसपास के इलाकों और लाठी क्षेत्र के तालाबों पर कुरजां को देखा जा सकता है.
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