
Jhalawar News: झालावाड़ जिले में इन दिनों सिंघाड़े को खेती शबाब पर है. जिले में रीछवा कस्बे के सिंघाड़ों का स्वाद और इसकी क्वालिटी लोगों को यहां के सिंघाड़े खाने को मजबूर कर देती है. यहां सिंघाड़े के खरीदार दूर-दूर से पहुंचते हैं और ले जाकर इसका व्यापार करते है. सर्दी के दिनों में सिंघाड़े का जमकर इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि यह सर्दी को दूर भागते हैं.
यहां के सिंघाड़े स्वादिष्ट और पोष्टिक होने के साथ-साथ बड़े आकार के भी होते हैं. इनसे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, और यही वजह थी कि कोविड-19 में भी लोगों ने इस बीमारी लड़ने के लिए सिंघाड़ों का खूब इस्तेमाल किया. जिले भर में रीछवा के सिंघाड़े की खूब डिमांड होती है. साथ ही जिले से सटे मध्य प्रदेश और गुजरात में भी इसकी जमकर बिक्री होती है.
सिंघाड़े की बेलों को बढ़ने में लगते हैं 3 से 4 महीने
सिंघाड़े की उत्पादन की प्रक्रिया भी काफी रोचक होती है. तालाब मे सिंघाड़े की खेती के लिए बरसात के पहले सिंघाड़े के बीजों को गड्डे करके लगाया जाता है, फिर जब बीज से बेलें बनने लगती हैं. तब तक बरसात भी हो जाती है और इन छोटी बैलों को एक-एक कर तालाब में लगाया जाता है. बेलों के बढ़ने में तीन से चार माह का समय लगता है. जब बेल लगाई जाती है तब से इसकी खेती करने वाले किसानों को बहुत मेहनत करनी पड़ती है.
प्रसिद्द हैं झालावाड़ के काले सिंघाड़े
सिंघाड़े की खेती करने वालों को तालाब में छोटी नाव का इस्तेमाल कर इसकी हर दिन देखभाल करना पड़ती है. तब जाकर सिंघाड़े तैयार होकर बाजार में बेचने लाये जाते हैं. बाजार मे दो प्रकार से सिंघाड़ा बिकता है. सिंघाड़े को कच्चा भी बेचा जाता है और उबालकर, काला रंग चढ़ाकर भी बेचा जाता है. झालावाड़ मे काले रंग चढ़े सिंघाड़े अधिक मात्रा में बिकते हैं. सर्दी में हलवे के साथ-साथ कई प्रकार के व्यंजन बनाने में ही सिंघाड़े का प्रयोग होता है.
यह भी पढ़ें - सुप्रीम कोर्ट में आज 15 लाख नौकरियां बचाने वाले मामले पर सुनवाई, राजस्थान सरकार ने मांगा था 1 साल का समय