Jodhpur Panchmukhi Hanuman: राजस्थान की सांस्कृतिक राजधानी जोधपुर न केवल अपने किलों के लिए, बल्कि अपनी प्राचीन आध्यात्मिक विरासत के लिए भी विश्व विख्यात है. शहर के स्थापना काल से भी पुराना एक ऐसा चमत्कारिक केंद्र यहां मौजूद है, जहां हनुमान जी की विशालकाय प्रतिमा किसी ने गढ़ी नहीं, बल्कि वह स्वयं पहाड़ का सीना चीरकर प्रकट हुई थी. यह है जिले के मेहरानगढ़ के पहाड़ों पर बसा ऐतिहासिक पंचमुखी हनुमान मंदिर, जहां की परंपराएं और प्रतिमा का स्वरूप आज भी भक्तों को विस्मित कर देती है.
हनुमान जयंती से पहले 30 दिन का होता है भगवान का श्रृंगार
इस मंदिर की सबसे अद्भुत विशेषता यहां का श्रृंगार है. हनुमान जयंती पर यहां प्रतिमा को चोला चढ़ाने की परंपरा है. इसके लिए प्रक्रिया एक महीने पहले ही शुरू कर दी जाती है. क्योंकि 21 फीट ऊंची और 25 फीट चौड़ी प्रतिमा होने के कारण, इसके बारीक और भव्य श्रृंगार को पूर्ण करने में पूरे 30 दिन का समय लगता है. इस अवसर पर हनुमानजी को चढ़ाया जाने वाला विशाल चोले में 11 किलो सिंदूर और 5 किलो तेल का उपयोग किया जाता है.

हनुमान जी की पंचमुखी प्रतिमा
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पाताल देवी को चरणों में दबाए हैं बजरंगबली
मंदिर के पुजारी संजय शर्मा बताते हैं कि यह प्रतिमा रामायण काल के उस प्रसंग को दर्शाती है जब अहिरावण भगवान श्री राम और लक्ष्मण को पाताल लोक ले गया था. इस मंदिर में स्थापित हनुमान जी की पंचमुखी अपने आप में ही खास महत्व रखती है. इस पंचमुख स्वरूप में 10 हाथ हैं और उनके बाएं पैर के नीचे 'पाताल की देवी' दबी हुई हैं. धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, प्रभु राम और लक्षम्ण को वापस लाने के लिए पाताल लोक में प्रवेश के समय हनुमान जी ने पाताल देवी को अपने पैरों से रौंद दिया था. जिसका दुर्लभ दृश्य इस मूर्ति के जरिए दिखता है. जो इस स्वरूप को पूरे प्रदेश में अद्वितीय बनाती है.

मेहरानगढ़ की चट्टानों के बीच बना मंदिर
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557 साल पुराना इतिहास और 108 सीढ़ियों की श्रद्धा
मेहरानगढ़ की चट्टानों के बीच स्थित यह स्वयंभू मंदिर जोधपुर शहर की स्थापना (1459 ई.) से भी प्राचीन माना जाता है. लगभग 557 वर्ष से अधिक पुराने इस स्थान की मान्यता है कि यहां दर्शन मात्र से भक्तों के समस्त कष्टों दूर हो जाते है. ऊंची पहाड़ी पर स्थित होने के कारण श्रद्धालुओं को 108 सीढ़ियां चढ़कर बजरंगबली के दरबार में पहुंचना पड़ता है.