राजस्थान में अक्सर शादियों के मौसम में खर्चों और शानोशौकत दिखाने की खबरें सुर्खियां बनती हैं. शादियों के सीज़न में कभी करोड़ों का मायरा भरने की आती है तो कभी दूल्हे के हेलिकॉप्टर से उड़कर दुल्हन के लाने जाने की. पिछले साल नागौर जिले के झाडेली परिवार ने 21 करोड़ रुपये का मायरा भरा था, जिसने मायरे को लेकर राजस्थान में सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे. इस साल भी ऐसी खबरें आनी शुरू हो गई हैं. इसी महीने नागौर में जायल से खबर आई कि वहां ललित व्यास और ओमप्रकाश व्यास नाम के दो भाइयों ने अपनी बहन गायत्री के बेटे नीलेश की शादी पर 1.61 करोड़ 61 का मायरा भरा. लेकिन, नागौर के ही एक गांव के जाट समाज ने इस चलन को फिजूलखर्ची बताते हुए इस पर रोक लगाने के लिए एकमत से फैसला किया है.
मायरा, शादी, मृत्युभोज में हो रही फिजूलखर्ची
रविवार, 15 फ़रवरी को नागौर के रियांबड़ी उपखण्ड के पादूकलां ग्राम में जाट समाज ने समाज सुधार को लेकर एक सभा की. श्री सूरजपुरी महाराज के स्थान पर आयोजित विशाल सामाजिक बैठक में कई महत्वपूर्ण एवं दूरगामी निर्णय लिए गए. बैठक में बुजुर्गों, युवाओं एवं प्रबुद्ध नागरिकों की सर्वसम्मति से विवाह, मायरा (भात)और मृत्युभोज में बढ़ती फिजूलखर्ची पर सख्त रोक लगाने का निर्णय लिया गया.
रियांबड़ी के प्रधान प्रतिनिधि, मदन गौरा ने कहा कि समाज ने यह स्वीकार किया कि समाज में छोटे-बड़े और आम परिवारों के बीच बढ़ते भेदभाव को समाप्त करना ज़रूरी है. बैठक में वक्ताओं ने कहा कि सोने-चांदी के तेजी से बढ़ते दामों और दिखावे की बढ़ती प्रवृत्ति ने गरीब, किसान और मध्यमवर्गीय परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ डाल दिया है. कई परिवार सामाजिक दबाव के कारण कर्ज लेने तक को मजबूर हो जाते है. साथ ही विवाह समारोहों में अधिक खर्च करने वाले और साधारण परिवारों के बीच सामाजिक दूरी भी बढ़ रही है.

जाट समाज ने तय की 5 तोला सोने की सीमा
इस स्थिति को समाप्त करने के उद्देश्य से समाज ने एकजुट होकर सादगी अपनाने का संकल्प लिया. जाट समाज के निर्णय के अनुसार, लड़के की शादी हो या लड़की की, इन दोनों ही स्थिति में अधिकतम 5 तोला सोने के जेवरात देने-लेने की सीमा तय की गई है. इससे अधिक सोना देने-लेने पर सामाजिक रोक रहेगी.
इसके साथ ही विवाह में बर्तन बांटने की प्रथा पूर्णतः बंद करने, मायरा (भात) में सादगी अपनाने तथा कपड़ों के स्थान पर सीमित व प्रतीकात्मक राशि देने पर सहमति बनी. मृत्युभोज में कपड़ों के लेन-देन की परंपरा समाप्त कर लिफाफे में सीमित राशि देने की व्यवस्था लागू की जाएगी. हल्दी व मेहंदी जैसे अलग-अलग आयोजनों को सीमित कर विवाह संस्कार सादगीपूर्ण ढंग से संपन्न कराने पर जोर दिया गया.
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