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'जब तक सांस है, पोस्ट नहीं छोड़ेंगे', मारवाड़ के सपूत की वो हुंकार, जिसने लद्दाख की पहाड़ियों पर लिख दिया इतिहास

1962 के भारत-चीन युद्ध में मेजर शैतान सिंह ने लद्दाख की बर्फीली और दुर्गम चोटियों पर शौर्य की वह गाथा लिखी, जिसे आज भी दुनिया सलाम करती है.रेजांग ला पोस्ट पर 13 कुमाऊं रेजिमेंट के मात्र 120 जांबाज जवानों के साथ उन्होंने चीन के 1300 से अधिक सैनिकों का मुकाबला किया.

'जब तक सांस है, पोस्ट नहीं छोड़ेंगे', मारवाड़ के सपूत की वो हुंकार, जिसने लद्दाख की पहाड़ियों पर लिख दिया इतिहास
परमवीर चक्र मेजर शैतान सिंह
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Major Shaitan Singh Martyr Story: राजस्थान की भूमि सदियों से त्याग, शौर्य और बलिदान की अटूट मिसाल रही है. मरुधरा के शूरवीरों के पराक्रम की गौरवगाथाएं न केवल इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हैं, बल्कि आज भी हर भारतवासी के दिल में देशभक्ति की अलख जगाती रहती हैं. जिसकी अमिट छाप आज भी मारवाड़ के सपूत परमवीर चक्र विजेता मेजर शैतान सिंह के रुप में दिलों में जलती रहती है. 

120 सैनिकों से साथ 1300 से अधिक चीनी सैनिकों का किया था मुकाबला

1962 के भारत-चीन युद्ध में मेजर शैतान सिंह ने लद्दाख की बर्फीली और दुर्गम चोटियों पर शौर्य की वह गाथा लिखी, जिसे आज भी दुनिया सलाम करती है.रेजांग ला (Rezang La) पोस्ट पर 13 कुमाऊं रेजिमेंट के मात्र 120 जांबाज जवानों के साथ उन्होंने चीन के 1300 से अधिक सैनिकों का मुकाबला किया. भीषण गोलाबारी और शून्य से नीचे के तापमान के बीच मेजर शैतान सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन उन्होंने पीछे हटने के बजाय अपनी अंतिम सांस तक जवानों का हौसला बढ़ाया. उनके इसी अदम्य साहस और नेतृत्व के कारण वह पोस्ट आज भी भारत के पास है। इस असाधारण वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत 'परमवीर चक्र' से सम्मानित किया गया.

 सैन्य परिवार में मेजर शैतान सिंह का हुआ था जन्म

उनकी वीरता को याद करते हुए सेवानिवृत्त कर्नल धनाराम सियाग और फ्लाइंग ऑफिसर नारायण सिंह जोधा ने बताया कि उनका जन्म 1 दिसंबर 1924 को एक सैन्य परिवार में हुआ था. माता जवाहर कंवर और पिता लेफ्टिनेंट कर्नल हेम सिंह के संस्कारों ने उनमें बचपन से ही देशभक्ति का जज्बा भर दिया था.शिक्षा पूरी करने के बाद वे भारतीय सेना की 13 कुमाऊं रेजिमेंट में अधिकारी के रूप में शामिल हुए.

1962 में चीनी सेना ने किया था भारत पर आक्रमण

साल 1962 में, जब चीन ने 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' के नारे की आड़ में भारत पर आक्रमण किया. उस समय शैतान सिंह की पोस्टिंग लदाख के रेजांग ला  (Rezang La) पोस्ट पर थी. वह कंपनी कमांडर थे. उस दौरान उनकी कंपनी में 120 सैनिक थे . चीन के असंख्यक सैनिक भारत पर हमला करने के इरादे से आगे बढ़ रहे थे और उस दौरान रेजांगला पोस्ट पर आर्टिलरी का सपोर्ट भी नहीं पहुंच पाया था. और उन्हें वापस आने का भी आदेश मिला लेकिन  उन्होंने इंकार कर दिया. 

आखिरी दम तक  की लड़ाई

उन्होंने कहा कि  'मैं अपने आखिरी सांस और अपने खून के आखिरी कतरे तक अपनी धरा को नहीं छोडूंगा' और 120 सैनिकों के साथ आखिरी दम तक लड़ाई की. इस लड़ाई में उन्होंने 13 से भी ज्यादा चीनी सैनिकों को मार गिराया और  चीनी सैनिकों को वहां से खदेड़ा. लेकिन अंत में उन्होंने अपना  बलिदान देकर के देश की धरोहर को बचाए रखा और उसके बाद उसे पोस्ट पर चीनी सैनिकों के आने की हिम्मत नहीं हुई और आज वर्तमान में भी वह पोस्ट भारत के पास ही है.

मूल रूप से फलोदी के निवासी मेजर शैतान सिंह की विरासत आज भी जीवंत है. उनके पैतृक निवास को अब 'मेजर शैतान सिंह नगर' के नाम से जाना जाता है. जोधपुर में स्थापित उनकी प्रतिमा पर हर साल राष्ट्रीय पर्वों और उनकी पुण्यतिथि पर सैनिक, पूर्व सैनिक और आम जन पुष्प चक्र अर्पित कर इस महान सपूत को नमन करते हैं.

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