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Shab-e-Baraat 2024: शब-ए-बारात पर रात भर सजीं रहीं मस्जिदें, इबादत करने और गुनाहों की माफी में गुज़री रात

इस्लाम में शब-ए-बारात को बहुत ही महत्वपूर्ण रात माना गया है. इस्लामी साल हिजरी के मुताबिक़ रमज़ान का महीना आने से पहले शाबान माह आता है. इस माह की 15 तारीख़ की रात में शबे बारात का एहतमाम किया जाता है.

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Shab-e-Baraat 2024:  शब-ए-बारात पर रात भर सजीं रहीं मस्जिदें, इबादत करने और गुनाहों की माफी में गुज़री रात

बीकानेर में शब-ए-बारात के पवित्र मौके पर शहर भर के मुस्लिम मोहल्लों में पूरी रात रौनक़ रही. तमाम शहर की मस्जिदों को सजाया गया और लोगों ने पूरी रात जागकर इबादत की. इस्लामी मान्यताओं के अनुसार इस रात की बहुत अहमियत है और ऐसा माना है की इस रात में अल्लाह की बारगाह में इबादत करते हुए अपने गुनाहों की माफ़ी मांगने पर सभी गुनाह माफ़ हो जाते हैं और नेक दुआएं क़ुबूल होती हैं.

बीकानेर की सभी मस्जिदों में पूरी रात ख़ास नमाज़ों व दूसरी इबादतों का एहतमाम किया गया, महिलाओं ने घर पर ही रहकर अल्लाह की बारगाह में सजदा कर सभी की मग़फ़िरत की दुआएं की. शब-ए-बारात के मौके पर रात को क़ब्रिस्तानों में भी भीड़ रही. लोगों ने बुज़ुर्गों की मज़ारों पर जाकर चराग़ां किया, फूल पेश किएऔर फातेहा पढ़कर दुआएं की. 

रमजान के पवित्र महीने से पहले आती है शबे बारात 

इस्लाम मज़हब के मानने वालों का ये अक़ीदा है कि शबे बारात की रात में अल्लाह की तरफ़ से हर इन्सान के लिए आने वाले साल का हिसाब-किताब लिख दिया जाता है यानी हर शख़्स की क़िस्मत इस रात में आने वाले साल के लिए लिख दी जाती है. पन्द्रह शाबान की इस रात को तमाम मुस्लिम धर्मावलम्बी जहाँ पूरी रात इबादत करते हैं और अपने गुनाहों की मुआफ़ी मांगते हैं, वहीं क़ब्रिस्तान जा कर अपने बुज़ुर्गों के मज़ारों पर रोशनी करते हैं. 

इस्लाम में शब-ए-बारात को बहुत ही महत्वपूर्ण रात माना गया है. इस्लामी साल हिजरी के मुताबिक़ रमज़ान का महीना आने से पहले शाबान माह आता है. इस माह की 15 तारीख़ की रात में शबे बारात का एहतमाम किया जाता है.

गुनाहों से माफ़ी की रात 

शब-ए-बारात का मतलब होता है बारातों यानी रोशनियों वाली रात. इस्लाम धर्म मे ये मान्यता है कि इस रात की रोशनी की शक्ल में अल्लाह की रहमतें यानी ईश्वर की कृपा बरसती है. इस रात में इबादत करते हुए ख़ुदा से जो भी मांगा जाए वो तो मिलता ही है, इसके अलावा तमाम पिछले गुनाह भी माफ़ कर दिए जाते हैं. आने वाले साल के लिए भी हर इन्सान का नसीब लिख दिया जाता है. ख़ुद के अलावा अपने मरहूम बुज़ुर्गों के लिए भी फ़ातेहा पढ़ कर दुआएं की जाती हैं ताकि उनकी ज़िन्दगी में हुए गुनाह भी माफ़ हो जाएं और उनकी बख़्शिश हो जाए.

इस्लाम धर्म मे ये मान्यता है कि इस रात की रोशनी की शक्ल में अल्लाह की रहमतें यानी ईश्वर की कृपा बरसती है. इस रात में इबादत करते हुए ख़ुदा से जो भी मांगा जाए वो तो मिलता ही है, इसके अलावा तमाम पिछले गुनाह भी माफ़ कर दिए जाते हैं.

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