Rajsamand News: राजस्थान के राजसमंद जिले की कृषि उपज मंडियों में गेहूं की सरकारी खरीद का काम युद्धस्तर पर जारी है. सरकार ने इस बार मावट (बेमौसम बारिश) की मार झेल चुके किसानों को राहत देते हुए कम चमक वाले गेहूं को भी 2735 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीदने के सख्त निर्देश दिए हैं. लेकिन, जमीनी हकीकत यह है कि सरकार की 'ऑनलाइन' प्रक्रिया ने किसानों के लिए फायदे से ज्यादा परेशानी खड़ी कर दी है. बुधवार का नजारा कुछ ऐसा है कि मंडी के गोदाम गेहूं की बोरियों से अटे पड़े हैं, मगर तकनीकी गड़बड़ियों के कारण किसान अपनी उपज बेचने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं.
गिरदावरी में गड़बड़ी और लक्ष्य का 'शून्य' खेल
राजसमंद जिले में इस साल 24,000 क्विंटल (करीब 48,000 कट्टे) गेहूं खरीद का लक्ष्य रखा गया है. 16 मार्च से शुरू हुई इस प्रक्रिया में अब तक करीब 3,000 क्विंटल की खरीद हो चुकी है. लेकिन सोनियाणा जैसे इलाकों से आए किसानों का कहना है कि पूरी गिरदावरी होने के बावजूद ऑनलाइन सूची में उनका लक्ष्य 'जीरो' दिख रहा है. वहीं, युवा किसान जगदीश चंद्र का दर्द है कि गिरदावरी में 60 बोरी गेहूं दर्ज था, लेकिन ऑनलाइन पोर्टल पर केवल 23 बोरी ही स्वीकृत की गई. इस कटौती के कारण किसानों को अपनी बाकी फसल वापस घर ले जानी पड़ रही है, जिससे ट्रैक्टर का किराया और मजदूरी का अतिरिक्त बोझ उन पर पड़ रहा है.

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अजीबोगरीब गड़बड़ी: गेहूं के बदले दिखा दी सरसों
ऑनलाइन सिस्टम की लापरवाही का आलम यह है कि मोही क्षेत्र के किसान किशनलाल तेली जैसे कई अन्नदाताओं के मोबाइल पर गेहूं के बदले सरसों की फसल का मैसेज आ रहा है, जबकि किसान के पास सरसों है ही नहीं. अब किसान इस उलझन में है कि वह अपना गेहूं कहां और कैसे बेचे? किसानों ने इस संबंध में पटवारी से लेकर तहसीलदार और कलेक्टर तक गुहार लगाई है, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकल पाया है. ऑनलाइन एंट्री में जमीन के अनुपात में गेहूं की कम स्वीकृति ने भी किसानों की मुसीबत बढ़ा दी है.
क्या कहते हैं जिम्मेदार और किसान?
एफसीआई (FCI) ठेकेदार नीरज अग्रवाल ने स्वीकार किया कि कुंवारिया क्षेत्र में जमाबंदी और गिरदावरी के नंबरों में अंतर के कारण दिक्कतें आ रही हैं. हालांकि, उन्होंने साफ किया कि सरकार के निर्देशानुसार दानों की चमक कम होने पर भी किसानों को 2735 रुपये का पूरा भाव दिया जा रहा है, लेकिन ऑनलाइन प्रक्रिया की त्रुटियां एक बड़ी बाधा बनी हुई हैं.
डगमगा रहा किसानों का भरोसा!
किसान प्रभु सिंह का कहना है कि उनके इलाके में सर्वाधिक पैदावार होती है, लेकिन ऑनलाइन 'जीरो' दिखने से सब ठप है. ऐसे में किसान इस दुविधा में है कि वह अपनी मेहनत की कमाई को कौड़ियों के दाम बिचौलियों को बेचे या सरकारी तंत्र के सुधरने का इंतजार करें. फिलहाल, राजसमंद की मंडियों में गेहूं के ढेर तो बढ़ रहे हैं, लेकिन किसानों का भरोसा डगमगा रहा है.
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