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Rajasthan: मूंडरू की पहाड़ी, जहां हनुमान जी करते हैं रखवाली और गुफाओं में आज भी बसते हैं नाग-नागिन

मुंडरू, श्रीमाधोपुर उपखंड का एक प्राचीन कस्बा है जो न केवल धार्मिक आयोजनों का केंद्र है, बल्कि यहां की पहाड़ियां और मंदिर महाभारत कालीन गौरव गाथाओं को आज भी अपने भीतर संजोए हुए हैं.

Rajasthan: मूंडरू की पहाड़ी, जहां हनुमान जी करते हैं रखवाली और गुफाओं में आज भी बसते हैं नाग-नागिन
Mundru, Sikar
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Sikar Mundru: राजस्थान का शेखावाटी अंचल में बसा 'मूंडरू' कस्बा एक ऐसी धर्म नगरी है, जिसे पौराणिक ग्रंथों में 'छोटी काशी' के नाम से जाना जाता है. श्रीमाधोपुर उपखंड का यह प्राचीन कस्बा न केवल धार्मिक आयोजनों का केंद्र है, बल्कि यहां की पहाड़ियां और मंदिर महाभारत कालीन गौरव गाथाओं को आज भी अपने भीतर संजोए हुए हैं. इतिहास को बयां करने वाले मंदिर एवं एशिया महाद्वीप की एक पत्थर की पहाड़ी यहां विद्यमान है. जिसके कारण यह अनोखी है.

मूंडरू का है बाबा श्याम से नाता

इतिहासकारों के अनुसार, इस कस्बे की स्थापना संवत 1616 के आसपास ठाकुर हरदयराम ने की थी. मूंडरू के नामकरण को लेकर एक बेहद रोचक मान्यता प्रचलित है. कहा जाता है कि यहां बाबा श्याम का 'मूंड' (शीश) रूपी पत्थर विद्यमान है, जिसके चलते इसका नाम मूंडरू पड़ा. एक अन्य मत के अनुसार, छोटी-छोटी पहाड़ियों और नदी प्रवाह के बीच यह कस्बा किसी 'मुंदड़ी' (अंगूठी) के समान दिखाई देता था, जिससे इसका प्राचीन नाम 'मुंदरी' पड़ा जो कालांतर में मूंडरू बन गया. 

51 मंदिरों की गूंज 

मूंडरू की सुरक्षा का जिम्मा जैसे स्वयं देवताओं ने संभाल रखा है. इसके चारों दिशाओं में प्राचीन हनुमान मंदिर प्रहरी की तरह खड़े हैं. उत्तर में डूंगरी बालाजी, दक्षिण में कोलवा बालाजी, पूर्व में सीताराम जी का मंदिर और पश्चिम में डाबर बालाजी का मंदिर है.  इसके अलावा कस्बे में बिहारीजी, नरसिंह मंदिर और जानकी नाथजी सहित कुल 51 छोटे-बड़े मंदिर हैं. शाम होते ही  इन मंदिरों में शंख और झालर की ध्वनियां गूँजती हैं, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है. यही कारण है कि इसे 'छोटी काशी' कहा जाता है.

बालाजी की प्रतिमा 

बालाजी की प्रतिमा 
Photo Credit: NDTV

सात समुद्रों की मिट्टी से निर्मित बालाजी की प्रतिमा 

पहाड़ी के शिखर पर 400 साल पुराना बालाजी का मंदिर है. मान्यता है कि यहां स्थापित बालाजी की दिव्य प्रतिमा सात समुद्रों की मिट्टी और जल से निर्मित है. श्रद्धालु मानते हैं कि यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है. मंगलवार और शनिवार को यहां दिल्ली, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों से श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है.

मूंडरूपी पहाड़ी और अभेद्य परकोटा

कस्बे की उत्तर-पश्चिमी दिशा में स्थित पत्थर की विशाल पहाड़ी पर्यटकों के लिए मुख्य केंद्र है. करीब 3000 हेक्टेयर में फैली इस पहाड़ी पर प्राचीन राजाओं के महल और चार फीट से भी अधिक मोटी दीवारों वाला मजबूत परकोटा बना है, जो प्राचीन शौर्य की याद दिलाता है.

भीम के पदचिह्न और नाग-नागिन की गुफाएं बनाती है इसे रोमांचकारी

यहां दो प्राकृतिक कुंड हैं, जिनमें वर्षभर वर्षा का जल संचित रहता है. इसे 'इंद्रजल' माना जाता है और आसपास के 20 किमी क्षेत्र के लोग धार्मिक कार्यों के लिए यहां से जल ले जाते हैं. पहाड़ी पर भीम के पदचिह्न और नाग-नागिन की गुफाएं रोमांच पैदा करती हैं. यहां हर सालआयोजित होने वाला तीज का मेला हजारों लोगों की भीड़ खींचता है।

भामाशाहों के सहयोग से संवर रहा है स्वरूप

वर्तमान में मूंडरू के इस गौरवशाली विरासत को सहेजने के लिए स्थानीय भामाशाह आगे आए हैं. पहाड़ी पर बने बुर्ज, परकोटे और मंदिर का जीर्णोद्धार किया जा रहा है.यात्रियों की सुविधा के लिए टीन-शेड, रेलिंग, लाइटिंग और भव्य द्वारों का निर्माण किया गया है, जिससे यह धार्मिक स्थल अब आधुनिक सुविधाओं से भी लैस हो रहा है.

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