
Lok Sabha Elections in India: स्वतंत्र भारत में पहला आम चुनाव वर्ष 1952 में हुआ था. वर्ष 1952 से 2024 तक के इन 72 वर्षों के सफर में भारतीय राजनीति में कई बड़े बदलाव देखे गए हैं. अब चुनाव में सिर्फ नेता और उनके मुद्दे ही नहीं बदले हैं, बल्कि प्रचार प्रसार के तौर तरीकों में भी बड़ा बदलाव देखा गया है. नई पीढ़ी, नए दौर के प्रचार प्रसार से प्रभावित है. जबकि पुराने दौर के लोग आज भी पुराने तरीको से नई पीढ़ी को अवगत करवा रहे हैं. सोशल मीडिया के इस दौर में नेताओं का सीधा जनता से चुनाव के लिए प्रचार प्रसार करने में सरलता तो देखी जा रही है, लेकिन पुराने दौर के प्रचार-प्रसार में व्यक्तिगत रूप से जनता का जुड़ाव होता था, जो आज के इस डिजिटलाइजेशन के दौर में कम देखा जा रहा है.
बताया जाता है कि स्वतंत्र भारत में पहला चुनाव वर्ष 1952 में हुआ था. उस समय खूब जमकर प्रचार हुआ करता था. उस दौर में आज की तरह सुविधाएं और संसाधन मौजूदा दौर के अनुरूप नहीं थे. पार्टियों और उसके उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार करने के लिए कई माध्यम अपनाने पड़ते थे. उस समय चुनावी जनसभा और नुक्कड़ सभाओं की मदद ली जाती थी. ये सभाएं बाजार के आसपास के इलाकों में की जाती थीं, जहां लोग आसानी से मिल जाते थे और नेताओं की बात को भी गौर से ध्यान से सुनते थे. लेकिन वर्तमान में चुनाव प्रचार के इस दौर में नुक्कड़ सभाओं की जगह वर्चुअल मीटिंग ने ले ली है. वहीं लाउडस्पीकर और मोहल्ले में होने वाली सभाओं की बजाय सोशल मीडिया पर होने वाले डिजिटल प्रचार ने ले ली है.
जोधपुर के भीतरी शहर के वरिष्ठ जनों के अनुसार, पहले गीत-संगीत, नुक्कड़ सभाओं के जरिए प्रत्याशी हर वोटर से मिलता था. क्षेत्र के चिन्हित मैदान, स्कूल, कॉलेज के मैदानों में नामी नेताओं का रैली होती थी. बड़े-बड़े नेता अपने पार्टी के उम्मीदवार के लिए अधिक लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया करते थे. लेकिन अब चुनावी रैली में पार्टी कार्यकर्ता भी रुचि कम दिखती हैं.
बिल्ले का स्थान स्टीकर ने ले लिया
72 वर्ष के सफर में शुरुआत में होने वाले लोकसभा चुनाव में नेता बैलगाड़ी या अपने चुनावी सिंबल के साथ जनता के बीच जाया करते थे. लेकिन वर्तमान में लग्जरी गाड़ियों या ओपन जीप में नेता प्रचार प्रसार करते देखे जा रहे हैं. वर्तमान समय के चुनावों में इलेक्शन कमीशन ने खर्च की सीमा पर कुछ हद तक लगाम लगा दी है. उम्मीदवार तय सीमा से ज्यादा पैसे खर्च नहीं कर सकता है. तय सीमा के अंदर ही उम्मीदवार को अपना प्रचार प्रसार करना होता है. ऐसे में चुनावी गाड़ियों के लिए भी कुछ नियम बनाए गए हैं. साथ ही अब सब यह सवाल आता है कि क्या पहले आम चुनाव के दौरान आज ही की तरह चुनावी गाड़ियों से प्रचार होता था! तो बता दें कि पहले आम चुनाव के दौरान भी प्रचार गाड़ियों का इस्तेमाल हुआ था. उस समय कांग्रेस और जनसंघ ने गाड़ियों से जमकर प्रचार किया था. कांग्रेस का चुनावी चिन्ह दो बैलों का जोड़ा था. कांग्रेस पार्टी और अन्य पार्टी के उम्मीदवार लोगों से वोट देने की अपील करते थे. वहीं उसे दौर में चुनावी सिंबल के तौर पर बिल्ले भी जनता में वितरित किया जाता है लेकिन अब उन बिल्ले का स्थान भी स्टीकर ने ले लिया.
पोस्टर की जगह फलेक्स बैनर का यूज
1952 में हुए पहला आम चुनाव के साक्षी रहे 85 वर्षीय गुरु गोविंद कल्ला ने बताया कि उसे दौर में चुनाव प्रचार के दौरान मेगा माइक और नेता जनता की क्षेत्र में जाकर हाथों से पोस्टर बनाए जाते थे. लेकिन अब फ्लेक्स बैनर से नेता प्रचार प्रसार कर रहे हैं. उसे दौर में समाचार पत्रों में भी बड़ी राजनीतिक पार्टियों के ही विज्ञापन आया करते थे और छोटे दलिया निर्दलीय प्रत्याशियों के इंटरव्यू प्रकाशित हुआ करते थे. लेकिन आज के इस दौर में मीडिया स्वतंत्र है, जहां कह सकते हैं कि प्रचार प्रसार के दौर में यह बदलते तौर तरीकों के रूप में देखा जा रहा है. युवा भी नए जमाने की नई प्रचार प्रसार से ही प्रभावित हैं.

1952 के चुनावी नारे 2024 में बना रहे माहौल
1952 में जोधपुर महाराजा ने चुनाव लड़ा था और उनका नारा था 'मैं थांसु दूर नहीं'. आज भी कई नेताओं की जुबान पर इसी तरह के नारे रहे हैं जो इन चुनाव में भी प्रचार प्रसार में देखे जा रहे हैं. यह बात वरिष्ठ नागरिक राजकुमार ने कही. उन्होंने आगे कहा कि उस दौर के चुनाव प्रचार का कंटेंट तो बदला है, लेकिन नेताओं के कई ऐसे नारे भी हैं जो उसे दौर में भी थे और इस दौर में भी यूज किए जा रहे हैं. जैसे- गरीबी हटाओ का नारा, शिक्षित बनने के नारा.
ये भी पढ़ें:- दोहरे संकट में फंसी कांग्रेस, स्टार प्रचारक करा रहे इंतजार, अब सामने आई ये परेशानी!