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बांसवाड़ा से लौट कर: 'दक्षिणी राजस्थान में गहरी छाप छोड़ रही 'बाप', आने वाले समय में और अधिक गहरी होती जायेगी'

बांसवाड़ा का यह चुनाव आदिवासी अस्मिता,आत्मसम्मान और दबदबे पर केंद्रित रहा. मुद्दे गौण रहे. समीकरण हावी. आदिवासी पार्टी ने इस चुनाव को पहचान के संघर्ष और सवाल पर लड़ा. भाजपा नेताओं के संविधान बदलने के बयान ने बाप को संजीवनी दी. आदिवासी आबादी में यह बात मजबूती से फैली/ फैलाई गई कि भाजपा आरक्षण को समाप्त कर देगी. बाप को इसका फायदा मिलेगा. 

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बांसवाड़ा से लौट कर: 'दक्षिणी राजस्थान में गहरी छाप छोड़ रही 'बाप', आने वाले समय में और अधिक गहरी होती जायेगी'
बांसवाड़ा में मतदान केंद्र की तस्वीर

राजस्थान की सभी सीटों पर वोटिंग हो चुकी है. मुझे जयपुर के अलावा बांसवाड़ा - डूंगरपुर जाने का मौका मिला. जो देखा, समझा वह यहां रख रहा हूं. 

बांसवाड़ा-डूंगरपुर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की भारी कमी है. कई इलाकों में पानी की कमी मुद्दा है. ट्रेन अब तक नहीं पहुंची है, मांग जारी है. रोजगार के लिए लोग गुजरात जाते हैं. गांव में बूढ़े बुजुर्ग और बच्चे ही दिखते हैं. कुपोषण के आंकड़े भयावह हैं लेकिन नेता ऐसा नहीं मानते. पहाड़ों और जंगलों के बीच बसे लोगों तक बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंची हैं. लेकिन यह किसी को वोट करने या न करने का आधार नहीं बन पाया. उसके दूसरे पैमाने हैं. 

इलाके में आपको सभी घरों पर जय श्री राम का एक जैसा स्टीकर दिखेगा. सनातन धर्म समिति नाम की संस्था ने अभियान के तौर पर ऐसा किया है. पूरा डूंगरपुर भगवा झंडो से पटा हुआ है. वहीं ईसाई मिशनरियों ने भी इलाके में अपनी पहुंच बढ़ाई है. सो, चर्च भी ठीक - ठाक संख्या में हैं. 

इस सीट पर मुकाबला कड़ा था. नई उभरती पार्टी भारत आदिवासी पार्टी के दमखम ने दोनों पार्टियों की चुनौती बढ़ाई. इसलिए भाजपा को दिग्गज कांग्रेसी नेता महेंद्रजीत मालवीया को अपने पाले में लाना पड़ा. और कांग्रेस को बाप को समर्थन देना पड़ा. यह बाप के लिए बड़ी बात है. 

बांसवाड़ा का यह चुनाव आदिवासी अस्मिता, आत्मसम्मान और दबदबे पर केंद्रित रहा. मुद्दे गौण रहे. समीकरण हावी. आदिवासी पार्टी ने इस चुनाव को पहचान के संघर्ष और सवाल पर लड़ा. भाजपा नेताओं के संविधान बदलने के बयान ने बाप को संजीवनी दी. आदिवासी आबादी में यह बात मजबूती से फैली/ फैलाई गई कि भाजपा आरक्षण को समाप्त कर देगी. बाप को इसका फायदा मिलेगा. 

भाजपा ने स्थानीय स्तर पर दमदार नेता की कमी भांपी और महेंद्रजीत मालवीया को लेकर आई. मालवीया की जगह अगर भाजपा का दूसरा कोई प्रत्याशी होता तो भाजपा इस चुनाव में शायद ही कहीं होती. मालवीया के राजनीतिक अनुभव और दांव पेंच के कौशल ने भाजपा को फायदा पहुंचाया है और इस चुनाव को दिलचस्प बनाया है. गैर आदिवासी वोट का बड़ा हिस्सा उनके पक्ष में लामबंद है. आदिवासी वोटरों में ठीक - ठाक सेंधमारी से वे खुश होंगे. हालांकि मालवीया के भाजपा में आने से स्थानीय स्तर पर भारी नाराजगी थी. अंदरखाने विरोध और विद्रोह दोनों हो रहा था.

पूरी रिपोर्ट यहां देखी जा सकती है- 

लेकिन मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कैंप कर स्थिति संभाली. कन्नी काट रहे नेताओं को यह तक कहा, “मैं सबके बूथ और इलाके के वोट देखूंगा.” संदेश साफ था. बेमन से सही, नाराज कार्यकर्ता भी लगे. पोलिंग बूथ पर इसका असर दिखा. मालवीया ने भाजपा में जाकर बड़ा रिस्क लिया है. वे चुनाव नहीं जीते तो यह बड़ा झटका होगा लेकिन जीते तो दिल्ली में उनके लिए बड़ी राहें खुलेंगी. और मैं बतौर पत्रकार यह उम्मीद करूंगा कि वे इलाके में कुपोषण दूर करने और बाकी सुविधाओं के लिए प्रयास करें.

राजकुमार रोत के पास खोने को कुछ नहीं लेकिन पाने को पूरा जहां है. विधानसभा चुनाव में पार्टी ने लोकसभा क्षेत्र में एक सीट जीती और 4 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही. बाप ने इस चुनाव को पूरी तरह से आदिवासी अस्मिता और आरक्षण के सवाल पर लड़ा है. कतारों में खड़े वोटर के जेहन में भी आरक्षण बचाना सबसे बड़ा मुद्दा था. परसेप्शन बनाने के जिस खेल में भाजपा आगे रहती थी, यहां उसी में बाप ने भाजपा को मात दे दी. बाप के पास सभी विधानसभा में उत्साही युवा कार्यकर्ताओं की फौज है. लोग यह भी कह रहे हैं कि भाजपा और कांग्रेस के नेता आदिवासियों के हक की बात नहीं उठा सकते, बाप ही उनके अधिकारों के लिए लड़ सकती है. आदिवासी मतदाताओं का बहुत बड़ा हिस्सा राजकुमार रोत को मिलेगा. इसमें मुस्लिम वोट भी जुड़ेंगे. यह बाप की ताकत है.

राजकुमार रोत के पास खोने को कुछ नहीं लेकिन पाने को पूरा जहां है. विधानसभा चुनाव में पार्टी ने लोकसभा क्षेत्र में एक सीट जीती और 4 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही. बाप ने इस चुनाव को पूरी तरह से आदिवासी अस्मिता और आरक्षण के सवाल पर लड़ा है. कतारों में खड़े वोटर के जेहन में भी आरक्षण बचाना सबसे बड़ा मुद्दा था.

लेकिन गैर आदिवासी वोट जुटाने के लिए काफी मुश्किल हुई है. क्योंकि वह तबका मानता है कि बाप के आने से उनके लिए मुश्किलें होंगी. इसके अलावे कांग्रेस से स्थानीय स्तर पर समन्वय न बन पाना भी नुकसान दे सकता है.
 ईवीएम पर कांग्रेस के निशान से बाप को बहुत ज्यादा नुकसान नहीं होगा. क्योंकि कांग्रेस के लिए कोई खुले तौर पर वोट नहीं मांग रहा था.

जीत - हार ईवीएम में कैद है लेकिन बाप का निशान इलाके में गहरी छाप छोड़ चुका है. जो आने वाले दिनों दूसरे इलाकों में फैले और, थोड़ा और गहरा हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा. बांसवाड़ा में पोलिंग बढ़ी. दोनों दलों ने अपने मतदाताओं को बूथ तक पहुंचाया. जनता ने किसमें फायदा देखा, यह ईवीएम में कैद है. मैंने क्या देखा, वह ट्वीट में तो है ही मेरी रिपोर्ट में भी है. देखेंगे तो अच्छा लगेगा.

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