तेज गति से चलती हुई मोटरसाइकिल नयापुरा, कोटा की चंबल पुलिया पर सेफ्टी-वाल से टकराती है और चालक की घटनास्थल पर ही मौत हो जाती है, पीछे की सीट पर बैठा सवार गंभीर रूप से घायल हो जाता है. इससे पहले राजधानी जयपुर में बेकाबू ऑडी एक दर्जन से अधिक लोगों को कुचलकर घायल कर देती है और एक की मौत हो जाती है. बेकाबू वाहन चालन से होने वाली मौतें अब रोजमर्रा की बात हो चुकी है.
युवा मौत छोटे बच्चों को अनाथ कर देती है, पत्नी कम उम्र में बेवा हो जाती है और परिवार बिखर जाता है. बिखरा हुआ परिवार कई मर्तबा समाज को बड़ी हानि पहुंचाता है, कई बार असमय अनाथ हुए बच्चे लालन-पालन के अभाव में मनोरोगी हो जाते हैं, भविष्य में अपराधी हो जाते है. लोलुप पुरुष प्रधान समाज युवा विधवा को आसानी से जीने नहीं देता है और कई बार उन्हें गलत रास्ते पर धकेल देता है.
किस वजह से बढ़ रही हैं दुर्घटनाएं
दुर्घटनाओं के मूल-कारणों का गहराई से अध्ययन किया जाए तो समझ आता है कि सभी दुर्घटनाओं के पीछे चालक में जीवन तथा जीवन-मूल्यों का अभाव होना है. जीवन-मूल्यों के अभाव में व्यक्ति को दायित्व-बोध होता ही नहीं है, व्यक्ति अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां समझ ही नहीं पता. ऐसा व्यक्ति स्वयं को नियमों से ऊपर समझता है और अनुशासनहीन होकर पशुवत व्यवहार करने लगता है. मानव का पशु होना ही इन दुर्घटनाओं का मूल कारण है.
साक्षर एवं शिक्षित होने में बड़ा अंतर है. साक्षर व्यक्ति अक्षरों को तो समझ सकता है किंतु जीवन एवं जीवन मूल्यों को नहीं. जबकि शिक्षित व्यक्ति अक्षरों के साथ-साथ जीवन मूल्यों को तथा दायित्व को बेहतरीन तरीके से समझता है. व्यक्ति में दायित्व-बोध वास्तविक शिक्षा से ही उत्पन्न होता है, साक्षरता से नहीं.
दुपहिया वाहन चालकों द्वारा सुरक्षा नियमों का पालन नहीं करना, मूर्खतापूर्ण तरीके से ओवर-टेकिंग करना, अनावश्यक तौर पर दोपहिया वाहन चलाते हुए मोबाइल पर मैसेज तक टाइप करना निश्चित तौर पर मौत को आमंत्रित करता है. शराब के नशे में वाहन एवं वाहन चालक दोनों बेकाबू हो जाते हैं और फिर...

महंगी गाड़ियां और तीन तरह का नशा
महंगी लग्जरी गाड़ियों से होने वाली दुर्घटनाओं में वाहन चालक तीन-प्रकार के नशे में होता है, दौलत का नशा, शक्तिशाली होने का नशा और शराब का नशा. इस त्रिआयामी नशे में चापलूस तथा अवसरवादी मित्रों के आत्ममुग्ध कर देने वाले वाक्य ऐसा तड़का लगाते हैं कि व्यक्ति रावण हो जाता है. सब कुचल डालने को आतुर हो जाता है और फिर कई जिंदगियों को लील जाता है.
अब समय आ गया है कि समाज को साक्षरता की सीमा-रेखा से आगे ले जाकर शिक्षित किया जाए, नियमों की अवेहलना एवं पालना में अंतर को स्पष्ट किया जाए, जीवन में अनुशासन की सीख हेतु पुरातन भारतीय परंपराओं का ही उपयोग करते हुए स्वतंत्रता एवं स्वच्छंदता के अंतर को स्पष्ट किया जाए. और हां, मौत की भयावहता और जीवन के आनंद को समझाया जाए.
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लेखक परिचयः देव शर्मा कोटा स्थित इलेक्ट्रिकल इंजीनियर और फ़िज़िक्स के शिक्षक हैं. उन्होंने 90 के दशक के आरंभ में कोचिंग का चलन शुरू करने में अग्रणी भूमिका निभाई. वह शिक्षा संबंधी विषयों पर नियमित रूप से लिखते हैं.
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.