भाजपा की ओर से राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची जारी होने के कुछ ही घंटों बाद कांग्रेस ने भी राज्यसभा की सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नाम तय कर दिए. पार्टी ने एक बार फिर नीरज डांगी पर भरोसा जताया है. मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में उनकी जीत तय मानी जा रही है, लेकिन इस फैसले के सियासी मायने सिर्फ एक सीट तक सीमित नहीं हैं. डांगी राजस्थान से राज्यसभा सांसद हैं. वे पहली बार जून 2020 के राज्यसभा चुनाव में निर्वाचित हुए थे. अब पार्टी ने उन्हें फिर से उम्मीदवार बनाया है. कांग्रेस के इस फैसले के पीछे पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की अहम भूमिका बताई जा रही है.
3 बार विधानसभा चुनाव भी लड़े
वे कई बार विधानसभा चुनावों में भी पार्टी के उम्मीदवार रहे हैं. 2003, 2008 और 2013 में कांग्रेस ने उन्हें अलग-अलग क्षेत्रों से चुनाव मैदान में उतारा, हालांकि वे विधानसभा तक नहीं पहुंच सके. इसके बावजूद पार्टी संगठन में उनकी भूमिका लगातार सक्रिय बनी रही. पारिवारिक पृष्ठभूमि की बात करें तो वे पूर्व राज्य मंत्री दिनेश राय डांगी के पुत्र हैं. उनके पिता राजस्थान की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे और पाली जिले की देसूरी विधानसभा सीट से विधायक भी रह चुके हैं. नीरज डांगी मूल रूप से सिरोही जिले के रहने वाले हैं.
दोबारा मुहर लगने से डांगी का कद बढ़ा
राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक, उम्मीदवार चयन की अंतिम प्रक्रिया में खड़गे का वीटो निर्णायक रहा और अंतिम मुहर उन्हीं की सहमति से लगी. माना जा रहा है कि डांगी को दोबारा मौका मिलना इस बात का संकेत है कि वे राष्ट्रीय नेतृत्व के भरोसेमंद नेताओं में शामिल हो चुके हैं. उनका राजनीतिक सफर कांग्रेस संगठन से जुड़कर शुरू हुआ. उन्होंने युवा कांग्रेस के माध्यम से सक्रिय राजनीति में कदम रखा और धीरे-धीरे संगठन में अपनी पकड़ मजबूत की. साल 2002 में वे राजस्थान युवा कांग्रेस के उपाध्यक्ष बने और बाद में राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी में महासचिव की जिम्मेदारी भी संभाली.
वोट बैंक को साधा, संतुलन की भी कोशिश
राज्यसभा के मौजूदा अंकगणित को देखें तो कांग्रेस के पास पर्याप्त संख्या बल है और एक सीट पर उसकी जीत लगभग तय मानी जा रही है. ऐसे में पार्टी ने किसी तरह का प्रयोग करने से परहेज किया. इस फैसले के जरिए कांग्रेस ने एक साथ कई राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है. पार्टी ने दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश की है. साथ ही राजस्थान कांग्रेस के भीतर गुटबाजी की अटकलों पर विराम लगाने के लिहाज से संतुलन साधने की कोशिश भी साफ नजर आती है. बीजेपी ने जाट और गुर्जर समाज से उम्मीदवार उतारकर जो समीकरण साधने की कोशिश की गई थी. उसके जवाब में कांग्रेस ने अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को मजबूत करने की दिशा में यह कदम उठाया है.
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