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This Article is From Nov 05, 2023

आई दिवाली, बढ़ी चाकों की रफ्तार, मिट्टी के दीए बनाने में जुटे कुम्हार

दीये बनाने के काम से जुड़े गोपाल प्रजापति ने बताया कि पहले ग्राहक 100 से ज्यादा दीपक खरीदते थे, लेकिन अब मात्र शगुन अदायगी रह गई. अब ग्राहक 11 या 21 दीपक ही खरीदते हैं. बदलते समय और प्रतिस्पर्धा के दौर में चीन के प्लास्टिक के दीये ने ले ली है, लेकिन इसके बावजूद भी दिवाली पर मिट्टी दीपक जलाने का महत्व कम नहीं हुआ है.

आई दिवाली, बढ़ी चाकों की रफ्तार, मिट्टी के दीए बनाने में जुटे कुम्हार
AJMER:

Diwali 2023: रोशनी के त्योहार दीपावली पर घराें को रोशन करने के लिए इन दिनों अजमेर के कुम्हार मोहल्ले में कुम्हारों ने चाक की रफ्तार बढ़ा दी है. कुम्हार मिट्टी को आकार देकर दीपक, हटरि, गुजरी, लक्ष्मी-गणेश जी, चौघड़िया, डिवट, बनाने में जुटे हैं. दिवाली इस बार 12 नवंबर को मनाई जानी है.

दीए बनाने वाले कुम्हारों ने बताया कि महंगाई के इस दौर में दीपक बनाना महंगा पड़ रहा है. इस काम में आय भी नाम मात्र की होती है. फिर भी परंपरा को बरकरार रखने के लिए दीपक बना रहे हैं.

आधुनिक युग में लोग अब बिजली सहित अन्य तरीकों से घरों को दीपावली पर सजाते हैं, लेकिन आज भी कई लोग मिट्टी के दीयों से घरों को रोशन करने की परंपरा जारी है. इन दिनों जिले भर में दिवाली की तैयारियां परवान पर है. खेताें से निपटने के बाद अब ग्रामीण घरों की सफाई में जुटे है. वहीं, शहर के लोग बाजारों से त्योहार के लिए सामान की खरीदारी कर रहे हैं.

मिट्टी के दीयों की प्राथमिकता कम 

दीये बनाने के काम से जुड़े गोपाल प्रजापति ने बताया कि पहले ग्राहक 100 से ज्यादा दीपक खरीदते थे, लेकिन अब मात्र शगुन अदायगी रह गई. अब ग्राहक 11 या 21 दीपक ही खरीदते हैं. बदलते समय और प्रतिस्पर्धा के दौर में चीन के प्लास्टिक के दीये ने ले ली है, लेकिन इसके बावजूद भी दिवाली पर मिट्टी दीपक जलाने का महत्व कम नहीं हुआ है. 

आसान नहीं दीयों को आकार देना

दीपक बनाने वाली चम्पा का कहना है कि मिट्टी को आकार देना आसान नहीं होता है. हर साल दीपावली से पहले मिट्टी को महीन करना, फिर गलाना, उसके कंकड़ साफ करना, इसके बाद चाक पर रखकर अलग-अलग आकार दिया जाता है. हर कोई सस्ता और अच्छा खरीदने की चाह रखता है. लेकिन शुद्ध रूप से मिट्टी से बनने वाले दीये की बात ही कुछ और है. वह और उनका परिवार पुश्त से मिट्टी के दीपक बना रहे हैं.

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दीये की कीमत सस्ती लेकिन महत्व अधिक

कुम्हार समाज का कहना है कि वर्तमान समय में प्लास्टिक के तरह-तरह के बर्तन आ गए हैं. इससे मिट्टी के बर्तनों की मांग भी कम है. इस काम में काफी मेहनत के बावजूद मुनाफा बहुत कम होता है. यही वजह है कि युवा पीढ़ी भी इस रोजगार में नहीं आना चाहते है. चाक पर बने मिट्टी के छोटे दीये की कीमत एक रुपया प्रति पीस की रखी है.

दिवाली में दीयों की हमेशा बनीं रहेगी मांग

कुम्हार परिवार की गायत्री प्रजापति ने बताया कि वह बीएड. कर रही है. और उसके तीन और भाई बहन इस काम में ज्यादा इंटरेस्ट नहीं लेते है, लेकिन दिवाली के त्योहार में ही परिवार के साथ में मिलकर दीये बनाने का काम करते हैं. पहले हम पिता और दादा के साथ बैठकर मिट्टी के बर्तन बनाना सीखते थे.

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