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यूजीसी नियमों के विरोध में जयपुर में शंखनाद, एक फरवरी को शहीद स्मारक पर जुटेगा सवर्ण समाज 

राजस्थान के जयपुर में यूजीसी से जुड़े नियमों के विरोध ने अब सार्वजनिक रूप ले लिया है. सामान्य वर्ग के संगठनों ने एक फरवरी को शहीद स्मारक पर शंखनाद सभा बुलाने का ऐलान किया है.

यूजीसी नियमों के विरोध में जयपुर में शंखनाद, एक फरवरी को शहीद स्मारक पर जुटेगा सवर्ण समाज 
जयपुर में यूजीसी का होगा विरोध.

Rajasthan News: राजस्थान की राजधानी जयपुर के शहीद स्मारक पर एक फरवरी को सामान्य वर्ग की ओर से शंखनाद सभा आयोजित की जाएगी. इस सभा का उद्देश्य यूजीसी से जुड़े उस नियम का विरोध दर्ज कराना है जिस पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है. आयोजकों का कहना है कि केवल न्यायिक रोक पर्याप्त नहीं है बल्कि नियम को पूरी तरह वापस लिया जाना चाहिए.

करनी सेना प्रमुख का बयान

करनी सेना के प्रमुख महिपाल मकराना ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया लेकिन कहा कि इससे समस्या खत्म नहीं हुई. उनके अनुसार यह नियम किसी मांग के आधार पर नहीं बल्कि जबरन लागू किया गया है. उनका आरोप है कि इसका सीधा असर सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों पर पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि अब सरकार को राजनीतिक स्तर पर जिम्मेदारी लेनी होगी.

कानून की तुलना रोलेट एक्ट से

मकराना ने इस नियम की तुलना अंग्रेजों के रोलेट एक्ट से की. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या देश में फिर से तनावपूर्ण हालात बनाए जा रहे हैं. उनका कहना है कि जो बच्चे जाति की राजनीति से दूर हैं उन्हें उसी दिशा में धकेला जा रहा है और समाज में विभाजन की स्थिति पैदा की जा रही है.

राजनीतिक संकेत भी दिए

उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि सामाजिक समीकरणों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. मकराना ने सामान्य वर्ग को देश की सामाजिक और आर्थिक रीढ़ बताया.

विप्र महासभा की भी प्रतिक्रिया

विप्र महासभा के संस्थापक सुनील उदेईया ने सुप्रीम कोर्ट की रोक को संविधान की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया. उन्होंने कहा कि संघर्ष अभी बाकी है. उनके अनुसार यह कानून विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को कमजोर करता है, एकपक्षीय निर्णय थोपता है, शिक्षकों की आवाज दबाता है और विद्यार्थियों के भविष्य को अनिश्चित बनाता है.

शिक्षा व्यवस्था पर खतरे की आशंका

उदेईया का कहना है कि इससे शिक्षा व्यवस्था में जातिगत तनाव बढ़ सकता है. उनका आरोप है कि शिक्षा, नौकरी और योजनाओं के जरिए समाज में विभाजन की राजनीति की जा रही है.

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