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जोधपुर में खिरच से पाली तक पहली बार 1882 में चली थी ट्रेन, जानिए कुल कितना आया था खर्चा

बैलों, भैसों द्वारा खींचे जाने वाली रेल कार नागरिकों के लिए काफी सुविधाजनक सिद्ध हुई. वैगन दिन में दो बार सार्वजनिक शौचालयों से मैला उठाते और सोजती गेट पर एक ट्रेन के रूप में जुड़ जाते फिर खुले में ले जाकर मैला खाली किया जाता.

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जोधपुर में खिरच से पाली तक पहली बार 1882 में चली थी ट्रेन, जानिए कुल कितना आया था खर्चा
जोधपुर की पहली रेल सेवा

Rajasthan News: जोधपुर में मारवाड़ के तत्कालीन महाराजा जसवंत सिंह (द्वितीय) ने 24 जून 1882 को खारची (मारवाड़ जंक्शन) से पाली तक 19 मील के रेल मार्ग पर पहली रेलगाड़ी को हरी झंडी दिखाकर रेलसेवा की शुरुआत की थी. उस समय महाराजा ने लगभग 5 लाख रुपए की लागत से रेल मार्ग बिछवाने का कार्य 31 मार्च, 1882 को पूर्ण करवा दिया. राजपूताना मालवा रेलवे अफसरों के मध्य संधि हो जाने के कारण खारची पर माल व सवारी गाड़ियों के एक लाइन से दूसरी लाइन पर ले जाने का पुख्ता इंतजाम हो गया.

किराए पर इंजन लेकर चलाई जाती थीं गाड़ियां

उसके बाद दूसरे चरण में पाली से लूणी तक मार्गनु की योजना बनाई गई और 31 जनवरी, 1885 तक 25 मील तक नई रेल लाइन बिछाई गई. 17 जून, 1885 को रेल का शुभारंभ किया गया. इसी प्रकार लूणी से जोधपुर तक 20 मील का रेल मार्ग 9 मार्च, 1885 को खोल दिया गया व जोधपुर स्टेशन तक रेल गाड़ी के आवागमन का श्रीगणेश हुआ. राजेन्द्र सिंह गहलोत ने बताया कि जोधपुर रेलवे के पास उस समय तक कोई भी इंजन नहीं था.

राजपूताना-मालवा रेलवे से इंजन किराए पर लेकर रेलगाड़ियां चलाई जाती थी, सन् 1883-84 में जोधपुर रेलवे के पास दो इंजन किराए के थे और दो प्रथम श्रेणी और दो द्वितीय श्रेणी तथा 10 तृतीय श्रेणी के डिब्बे तथा 30 मालगाड़ी डिब्बे व 20 अन्य वैगन और तीन ब्रेकवान भी थे. सन् 1885 को जोधपुर के तत्कालीन महाराजा ने 1878 में लंदन में निर्मित एक पुराना इंजन 13 हजार रुपए में खरीदा. सन 1924 तक जोधपुर रेलवे के पास 134 इंजन हो गए थे.

बैल व भैंसों द्वारा खींची जाती थी रेल कार

बैलों, भैसों द्वारा खींचे जाने वाली रेल कार नागरिकों के लिए काफी सुविधाजनक सिद्ध हुई. वैगन दिन में दो बार सार्वजनिक शौचालयों से मैला उठाते और सोजती गेट पर एक ट्रेन के रूप में जुड़ जाते फिर खुले में ले जाकर मैला खाली किया जाता. जोधपुर से जैसलमेर 300 कि.मी. बड़ी लाइन पर मात्र 23 दिनों में आमान परिवर्तन कर यह रेल मार्ग खोला गया, देश स्वतंत्र होने पर जोधपुर रेलवे का 1949 में 'भारतीय रेल' में विलय हो गया व सन् 1952 में यह उत्तर रेलवे का एक भाग बन गया.

जोधपुर राज्य में रेलवे की स्थापना से लेकर देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात तक रियासत में नई रेल लाइनों के निर्माण का कार्य निरंतर रूप से चलता रहा. इस रियासत क्षेत्र में रेलवे ने न केवल सामरिक दृष्टिकोण से अपनी अहम् भूमिका अदा की बल्कि प्रशासनिक एकरूपता, व्यापार, वाणिज्य तथा सामाजिक जीवन को भी प्रभावित किया. जोधपुर से अहमदाबाद की बड़ी लाइन जुलाई, 1996 में शुरू हुई. वहीं वर्ष 1994 को ब्रॉडगेज की प्रथम रेलगाड़ी जयपुर-जोधपुर लाइन पर रवाना हुई. जहां जोधपुर से कोरा के लिए 1994 को शुरू होकर जयपुर से बीकानेर गई.

1994 को प्रथम सवारी गाड़ी बॉडगेज रेल लाइन पर क्ली सैनिकों की खातिर रेलवे के वीरों ने भी दी कुर्बानी सन् 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान शहीद हुए 14 रेल कर्मियों की स्मृति में बना 'अमर स्मृति शहीद स्मारक' (गहरा रोड एवं गागरिया रेलवे स्टेशन के माय) वैरो गेज पीपाड़ रोड से बिलाड़ा खंड को 1928 को मीटर गेज में परिवर्तित कर शुरू किया गया.


जोधपुर में तैनात ब्रिटिश अधिकारी की अनूठी जिद्द

राजेन्द्र सिंह गहलोत ने बताया कि जब जोधपुर में रेलवे में आर. सी. बैटर नामक एक ब्रिटिश अधिकारी जो कि उस समय डी.टी.एस. पद पर कार्यरत थे. वे अक्सर गार्ड व ड्राइवर की बात नहीं मानते थे, न ही उनकी सुनते थे और उनकी रुचि बड़ी ही अजीबोगरीब थी. वे रेलगाड़ी की रफ्तार तेज होने पर साथ-साथ दौड़ते हुए गाड़ी पर चढ़ते थे और तब तक गार्ड और ड्राइवर उनके गाड़ी पर चढ़ने का इंतजार करते थे तो वे उन्हें डांटकर कहते थे, आप गाड़ी समय पर क्यों नहीं रवाना करते हैं."

एक बार गार्ड व ड्राइवर ने उनकी आदत छुड़ाने के लिए 'पिथौरा' रेलवे स्टेशन पर जब वे उतरे तो गार्ड ने अचानक झंडी दिखाकर गाड़ी को रवाना कर दिया. मिस्टर बैटर नीचे ही रह गए, बाद में जोधपुर लौटकर उन्होंने गार्ड व ड्राइवर को घर पर बुलाया और शाबासी व पुरस्कार देकर सम्मानित किया. वही जोधपुर रेलवे में ही एक मि. जे.डब्ल्यू. गार्डन अंग्रेज जनरल मैनेजर के पद पर कार्यरत थे जो सदैव अपने कार्यालय में नेकर ही पहनकर आते थे. इस ब्रिटिश अधिकारी का त्याग आज भी नही भुलाया जा सकता इन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान विशेष ट्रेन से सैनिकों के लिए अनाज पहुंचाया था और गेहूं की कमी को देखते हुए उन्होंने स्वयं के लिए व अपने अधीन अधिकारियों तथा कर्मचारियों के लिए एक वक्त बाजरे की रोटी खाने का आर्डर निकाल दिया था.

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