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जोधपुर के आकाश लोढ़ा के पास आज भी मौजूद है 1895 का 250 किलो वजनी बेल

जोधपुर के आकाश लोढ़ा के पास कई ऐतिहासिक दुर्लभ नायाब धरोहरों का खजाना भी इन्होंने अपने इस संग्रहालय में समेटा है, जिससे आज की नई पीढ़ी शायद ही वाकिफ होगी.

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जोधपुर के आकाश लोढ़ा के पास आज भी मौजूद है 1895 का 250 किलो वजनी बेल
आकाश लोढ़ा

Rajasthan News: जोधपुर के 45 वर्षीय आकाश लोढ़ा ने अपने दादा और पिता से प्रेरणा लेकर कई दुर्लभ ऐतिहासिक वस्तुओं को अपने घर पर ही बनाए गए संग्रहालय में संरक्षित किया हुआ है. उसके अलावा कई ऐतिहासिक दुर्लभ नायाब धरोहरों का खजाना भी इन्होंने अपने इस संग्रहालय में समेटा है, जिससे आज की नई पीढ़ी शायद ही वाकिफ होगी. यहां आने वाले देशी-विदेशी पर्यटक भी इनके इस संग्रहण को देख कर आकर्षित होते हैं. राजशाही शासन के दौर में राजा-रजवाड़ा के किले-महलों में लगाये जाने वाले दुर्लभ ताले का कलेक्शन भी इनके पास आज भी है. 

3 किमी तक बेल की आज सुनाई देती

वर्ष 1895 के समय का 250 किलो वजनी बेल आज भी इनके पास संरक्षित है, जिसकी आवाज 3 किलो मीटर तक सुनाई देती है. वही मुगलकाल के दौर के कई ऐतिहासिक सिक्के इनके पास संरक्षित हैं जिस पर अरबी भाषा में मुगलकाल के दौर की भाषा भी अंकित है. 100 वर्ष पुराना ब्रास से बना मल्टी टिफिन भी उनके पास मौजूद है. आकाश लोढ़ा ने बताया कि उनको यह प्रेरणा उनके दादा संपत राज जैन से मिली है. आज जिस प्रकार से वर्तमान में स्टील अधिक प्रचलन में है. वही पुराने दौर में पीतल व तांबा अधिक उपयोग में लिया जाता था. पहले के समय पानी को संरक्षित रखने के लिए उपयोग में ली जाने वाली 'चरु' आज भी उनके संग्रहालय में संरक्षित है. 

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आकाश के पास है मल्टीपल टिफिन

उसका वजन भी करीब 10 किलो से अधिक है और इसकी विशेषता यह होती थी कि इसमें पानी लंबे समय तक सुरक्षित भी रहता था और उसमें कीड़े लगने की संभावना भी नहीं रहती और पानी पीने के लिए भी शरीर के लिए मेडिसिन का काम करता था और उसे दूर के जो मेटल उपयोग में लिए जाते थे उनसे शरीर में भी एनर्जी और ऊर्जा मिलती थी. इसके अलावा पुराने दौर में जहां लकड़ी और कोयले के उपयोग से चूल्हे पर खाना बनाया जाता था, आज भी उनके पास पहले के समय इस्तेमाल किया जाने वाले स्टोव है, जो मिट्टी के तेल से चलता था.

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इसके अलावा मल्टीपल टिफिन हुआ करता था, जिसमें प्लेट्स और चम्मच की आवश्यकता भी नहीं होती और वह मल्टीपल टिफिन सारा काम कर देता था. राजशाही शासन के दौर में राजा रजवाड़ा के महल पर लगने वाले ताले भी उनके कलेक्शन भी शामिल हैं. जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में डिमांड है. इन तालों को खोलने के लिए चाबी से अधिक उपयोग व्यक्ति की ट्रिक काम में आती थी.  इन विलुप्त होती ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने के साथ ही उनके इस नायाब खजाने को देखने के लिए देसी विदेशी पर्यटक भी उनके इस संग्रहालय में आते हैं. 

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