Jaipur Literature Festival: एम. एस. स्वामीनाथन को सब जानते हैं. देश में हरित क्रांति लाने का श्रेय उन्हें जाता है और उन्हें भारत रत्न से भी नवाज़ा गया है. लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि मोनकोम्बु संबशिवन स्वामीनाथन को किसानों को हाइब्रिड बीज बोने के लिए राज़ी करने में महीनों लग गए थे. “द मैन हू फेड इंडिया” एम. एस. स्वामीनाथन पर आधारित प्रियंबदा जयकुमार की किताब है. यह देश के एक श्रेष्ठ वैज्ञानिक के संघर्ष की कहानी है.
इस किताब में बताया गया है कि एक दौर था जब किसान उच्च उपज वाले बीज बोने के लिए तैयार नहीं थे. उनका कहना था कि प्रयोग करने के लिए उन्हें पैसे चाहिए. वहीं स्वामीनाथन और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के वैज्ञानिकों का कहना था कि सरकार से प्रयोग के लिए कोई धन नहीं मिला है, लेकिन ज़्यादा उपज वाले बीज बोने से भविष्य में मुनाफ़ा ज़रूर होगा. इसके बावजूद किसान उनकी बातों से सहमत नहीं हुए.
गांव-गांव भटकते रहे
लेकिन एम. एस. स्वामीनाथन ने हिम्मत नहीं हारी और हफ़्तों तक दिल्ली के आसपास के खेतों और गाँवों में भटकते रहे. रविवार को छुट्टी के दिनों में भी स्वामीनाथन गाँवों के दौरे पर निकल जाते थे. उनके साथ उनकी पत्नी और बेटियाँ भी होती थीं. बेटियों को लगता था कि वे पिकनिक मनाने निकले हैं, लेकिन वास्तव में स्वामीनाथन किसानों को नई कृषि पद्धतियाँ अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे थे.
ये बीज उन्होंने मेक्सिकन गेहूँ की बौनी किस्मों को भारत में आयात कर, भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाने के लिए स्थानीय प्रजातियों के साथ क्रॉस-ब्रीडिंग करके विकसित किए थे. इन किस्मों के नाम थे- कल्याण सोना और सोनालिका.
आख़िरकार हरियाणा के जोंटी गाँव में एक किसान ने ये बीज अपनाए. नवंबर 1964 में हरियाणा के इसी छोटे से गाँव जोंटी से हरित क्रांति की शुरुआत हुई. 1965 में जब पहली पैदावार हुई, तो आसपास के किसान यह चमत्कार देखने के लिए जोंटी में इकट्ठा हो गए.
Priyambada Jayakumar and Manu Joseph explore the paradoxes of progress in contemporary India. In M.S. Swaminathan: The Man Who Fed India, Jayakumar traces the life of the scientist whose vision sowed hope during the Green Revolution. In Why the Poor Don't Kill Us, Joseph examines… pic.twitter.com/hJmvbck6KC
— jaipurlitfest (@JaipurLitFest) January 15, 2026
एम. एस. स्वामीनाथन ने चुना अलग रास्ता
प्रियंबदा जयकुमार की यह किताब सिर्फ हरित क्रांति की कहानी नहीं है, बल्कि एम. एस. स्वामीनाथन के पूरे जीवन की कहानी है. उनका जन्म एक तमिल ब्राह्मण परिवार में हुआ. उनके पिता डॉक्टर थे. लेकिन बचपन में किसानों को क़रीब से देखकर उन्होंने कृषि विज्ञान पढ़ने का निर्णय लिया. 1942 और 1943 में बंगाल में पड़े भयंकर अकाल का स्वामीनाथन पर गहरा प्रभाव पड़ा. उन्होंने कृषि विज्ञान की पढ़ाई का रास्ता चुना.
परिवार को लगता था कि वे डॉक्टर या इंजीनियर बन सकते थे, लेकिन स्वामीनाथन के मन में अकाल से जुड़ी त्रासदी की तस्वीरें बसी हुई थीं. उन्होंने 19 वर्ष की उम्र में वह रास्ता चुना, जिसने देश की तक़दीर और तस्वीर दोनों बदल दीं.
प्रियंबदा जयकुमार एम. एस. स्वामीनाथन की नज़दीकी रिश्तेदार हैं. उन्होंने स्वामीनाथन से उनके जीवन पर कई साक्षात्कार किए, जिनके आधार पर उन्होंने एक किताब लिखी जो पिछले साल प्रकाशित हुई.
अटकी पड़ी स्वामीनाथन रिपोर्ट
हालांकि प्रियंबदा बताती हैं कि एम. एस. स्वामीनाथन हरित क्रांति के दुष्प्रभावों को लेकर भी चिंतित रहते थे. उन्हें लगता था कि पुरानी पीढ़ी प्रकृति का इतना दोहन न करे कि नई पीढ़ी के लिए कुछ भी न बचे. वो चाहते थे कि पर्यावरण संरक्षण के साथ खेती हो, ताकि रासायनिक कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग न हो और जल संसाधनों का अंधाधुंध दोहन न किया जाए.
कृषि की चुनौतियों से निपटने के लिए स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट आज भी चर्चित है, लेकिन इसे कभी पूरी तरह लागू नहीं किया गया. क्या वे इससे नाराज़ थे? "नहीं", प्रियंबदा कहती हैं,"क्योंकि उनका सपना हरित क्रांति के बाद सदाबहार क्रांति का था. ऐसी क्रांति जो कृषि को टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बनाए, बिना मिट्टी और जल जैसे प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुँचाए लगातार खाद्य उत्पादन बढ़ाए और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करे."
जयकुमार की यह किताब उस इंसान की जीवनी है, जिनके प्रयासों से भारत खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में वास्तव में आत्मनिर्भर बन सका. यह किताब केवल एक जीवनी नहीं है, बल्कि आज़ादी के बाद के भारत के संघर्ष, मूल्यों और आदर्शों की कहानी भी है, जब स्वामीनाथन जैसे देशभक्तों ने देशप्रेम और सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था.
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