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MSBU Controversy: भ्रष्टाचार के आरोपों से कुर्सी गंवाने वाले इस यूनिवर्सिटी के पूर्व VC को लगा बड़ा झटका, हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

Rajasthan News: भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़ा करने के आरोप में महाराजा सूरजमल बृज विश्वविद्यालय (एमएसबीयू) के पूर्व कुलपति प्रोफेसर रमेश चन्द्र को हाइकोर्ट से तगड़ा झटका लगा है. मंगलवार को पूरी हो चुकी सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है.

MSBU Controversy: भ्रष्टाचार के आरोपों से कुर्सी गंवाने वाले इस यूनिवर्सिटी के पूर्व VC को लगा बड़ा झटका, हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
कुलपति प्रो. रमेश चंद्र.
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MSBU Controversy News: भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़ा करने के आरोप में अपनी कुर्सी गंवाने के बाद महाराजा सूरजमल बृज विश्वविद्यालय (एमएसबीयू) के पूर्व कुलपति प्रोफेसर रमेश चन्द्र को हाइकोर्ट से तगड़ा झटका लगा है. बीते दिन मंगलवार को पूर्व कुलपति की याचिका पर सुनवाई करते हुए  हाइकोर्ट के न्यायाधीश ने रिट याचिका खारिज कर दी है. जिसके बाद  पूर्व कुलपति को अपनी कुर्सी वापस मिलने का रास्ता न के बराबर दिख रहा है. 

पूर्व कुलपति ने दी थी आदेश को चुनौती 

दरअसल, पूर्व कुलपति ने महाराजा सूरजमल बृज यूनिवर्सिटी के खिलाफ अपने निलंबन और पद से हटाने के आदेश को चुनौती दी थी. जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया है. साथ ही माना कि कुलाधिपति ने वैधानिक अधिकारों के अंतर्गत और विधि अनुसार प्रक्रिया अपनाकर यह आदेश पारित किया.

 जज ने माना नहीं हुआ प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन

राजस्थान उच्च न्यायालय के जस्टिस आनंद शर्मा ने मामले की सुनवाई में कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा का दायरा केवल निर्णय-प्रक्रिया की वैधता की जांच तक सीमित है, न कि निर्णय के गुण-दोष पर. रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता को नोटिस, सुनवाई का अवसर तथा उत्तर पर विचार प्रदान किया गया, इसलिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं हुआ. कोर्ट ने मामले में 11 फरवरी को फैसला रिजर्व रखा था. जिसके बाद कल (मंगलवार) को कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया. 

न्यायालय ने खारिज की याचिका

राजस्थान हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद शर्मा ने केस की सुनवाई करते हुए कहा कि आर्टिकल 226 के तहत न्यायिक समीक्षा का दायरा सिर्फ फैसला लेने के प्रोसेस की वैधता की जांच करने तक ही सीमित है, न कि फ़ैसले के मेरिट या डिमेरिट पर. रिकॉर्ड से साफ है कि याचिकाकर्ता को नोटिस के साथ- साथ सुनवाई का मौका भी दिया गया. साथ ही उनकी तरफ से दिए गए जवाबों पर विचार भी किया गया इसलिए इस मामले में कही से भी नहीं लगा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं हुआ.बता दें कि  कोर्ट ने इस मामले में फैसला 11 फरवरी को रिजर्व कर लिया था, जिसे कोर्ट ने कल (मंगलवार) अपना सुनाया.

कुलाधिपति का निर्णय सही

बता दें कि याचिकाकर्ता ने 28 मार्च 2025 के निलंबन आदेश और 11 नवंबर 2025 के पद से हटाने के आदेश को रद्द करने के साथ ही पुन:बहाली सहित अन्य लाभ देने की मांग की थी. न्यायालय ने पाया कि कुलाधिपति को संबंधित विश्वविद्यालय कानून के तहत जांच और राज्य सरकार से परामर्श के बाद ऐसा करने का अधिकार था.

क्या था मामला

महाराजा सूरजमल बृज विश्वविद्यालय कुलपति प्रोफेसर रमेश चंद्र के खिलाफ विश्वविद्यालय के छात्र काफी समय से भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़ा करने के आरोप लगा रहे थे. इसको लेकर बीते दिनों राज्यपाल के सामने भी छात्रों ने वीसी पर आरोप लगाएं थे. इसी संदर्भ में छात्रों ने राज्यपाल को भी लिखित में शिकायत दी थी. इसके बाद राज्यपाल के निर्देश पर भरतपुर के संभागीय आयुक्त ने मामले की जांच की गई.जिसमें  कुलपति पर फर्जीवाड़ा और भ्रष्टाचार करने के आरोप साबित हुए. इसको लेकर संभागीय आयुक्त ने राज्यपाल को अपनी रिपोर्ट प्रेषित की. इसके बाद राज्यपाल ने सरकार से सलाह लेकर कुलपति को सस्पेंड कर दिया हैं.

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