Pushkar varah Mandir: ब्रह्मा की नगरी पुष्कर में मौजूद भगवान विष्णु के वराह अवतार का 10वीं सदी का प्राचीन मंदिर मकर संक्रांति के मौके पर आस्था का बड़ा केंद्र बना रहा. यहां मकर संक्रांति पर भगवान धर्मराज की पूजा करने और उनकी कथा सुनने की परंपरा सदियों पुरानी है. यहां स्थापित वराह मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां धर्मराज भगवान वराह के द्वारपाल के रूप में विराजमान हैं. मंदिर की स्थापना के साथ ही यहां धर्मराज की मूर्ति भी स्थापित की गई थी. इसी परंपरा के कारण संक्रांति के दिन मंदिर परिसर में मेले जैसा माहौल रहता है. भक्त दान-पुण्य करते और धर्मराज की कथा सुनकर पुण्य लाभ कमाने की कामना करते हैं.
सिर पर पगड़ी और पहरेदार के रूप में बैठे है धर्मराज
मकर संक्रांति पर तीर्थ नगरी पुष्कर में दान और पूजा का खास महत्व होता है. इस दिन भक्त पुष्कर सरोवर में पवित्र स्नान करके पूजा कर पिता ब्रह्मा के दर्शन करते हैं.इसके अलावा कई तीर्थयात्री ऐसे भी होते है, जो भगवान वराह मंदिर में स्थित भगवान धर्मराज के दर्शन के लिए मंदिर जाते है. मंदिर के मेन गेट पर भगवान धर्मराज की अनोखी मूर्ति स्थापित है जिसमें धर्मराज सिर पर पगड़ी पहने हुए हैं और पहरेदार के रूप में बैठे हुए हैं.
महा पुण्य काल में दान का विशेष योग
पंडित दिलीप शास्त्री के अनुसार, मकर संक्रांति पर शुभ समय दोपहर 3:13 बजे से शाम 5:55 बजे तक था, जबकि महापुण्य का समय दोपहर 3:13 बजे से शाम 4:58 बजे तक माना गया. इसी समय सूर्य ने मकर राशि में प्रवेश किया, जिससे दान-पुण्य के लिए अद्भुत अवसर बना। सुबह करीब 7 बजे तापमान 7 डिग्री सेल्सियस होने के कारण शुरुआत में श्रद्धालुओं की संख्या कम थी, लेकिन जैसे-जैसे सूर्य की किरणें तेज होती गईं, पुष्कर सरोवर और मंदिरों में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ गई। पूरे दिन आस्था, भक्ति और पुण्य का माहौल बना रहा.
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